गुणानुवाद सभा में आचार्य श्री विजय कुलबोधि सूरीश्वरजी म.सा. ने कहा


रतलाम, 19 जुलाई। युगप्रभावक आचार्य देव श्री भुवनभानु सूरीश्वरजी म.सा. के समुदाय के पूज्य मालव भूषण आचार्य देव श्री वीररत्न सूरीश्वरजी म.सा. शेयरिंग, डेयरिंग, केयरिंग नेचर के पर्याय थे। मैं उनके चरणों में श्रद्धांजलि, भावांजलि, पुष्पांजलि समर्पित करता हूं। यह बात सैलाना वालों की हवेली मोहन टॉकीज में आयोजित गुणानुवाद सभा के दौरान आचार्य श्री विजय कुलबोधि सूरीश्वरजी म.सा. ने कही।
आचार्य श्री ने कहा कि रतलाम में चातुर्मास करने का आग्रह उनको था, क्योंकि रतलाम से उनका लगाव था लेकिन उन्होंने यह सुअवसर मुझे दिया। देवास में चातुर्मास के दौरान प्रभु की छह मूर्तियां चोरी होने पर वे अनशन पर बैठ गए थे। इस पर कलेक्टर ने उनसे प्रार्थना कर सात दिन में मूर्तियों के साथ चोरी गई सामग्री तलाश कर दी थी। उन्हे गले का केंसर होने पर जब मैं मिलने गया तब उन्होने कहा कि तुम भी अपना ध्यान रखना। साधनों का उपयोग करना पडे़, तो पूरा करना। अंतिम समय में जब पीड़ा होती है तो कोई साथ नहीं होता है, पीड़ा हमें ही सहन करना होती है।
आचार्य श्री ने कहा कि लाखों लोग आते और जाते है लेकिन उनकी कोई कहानी नहीं होती है लेकिन जो कुछ करके जाता है, उनकी अमर कहानी होती है। ऐसे हमारे गुरूदेव थे। उन्होंने पांच प्रकार का जीवन जीया, जोकि रम्य, धन्य, भव्य, नव्य और दिव्य था। इसे परिभाषित करते हुए कहा कि जीवन में संस्कार होते है तब जीवन रम्य होता है। धन्य जीवन सत्संग से बनता है। 12 वर्ष की आयु में गुरूदेव ने जब दीक्षा ली तब उनका जीवन रम्य और धन्य के साथ भव्य भी हो गया।
आरंभ में पूर्व मंत्री हिम्मत कोठारी सहित विभिन्न संस्थाओं से जुड़े पदाधिकारियों द्वारा पूज्य मालव भूषण आचार्य देव श्री वीररत्न सूरीश्वरजी म.सा. को श्रद्धांजलि अर्पित की गई। इस दौरान श्री देवसूर तपागच्छ चारथुई जैन श्रीसंघ गुजराती उपाश्रय, श्री ऋषभदेवजी केशरीमलजी जैन श्वेताम्बर तीर्थ पेढ़ी रतलाम के सदस्य एवं बढ़ी संख्या में श्रावक-श्राविकाएं उपस्थित रहे।