चातुर्मास से मिला धर्म साधना का सुअवसर इसे व्यर्थ में न गवाएं-इन्दुप्रभाजी म.सा.

  • धर्म से जुड़ने पर जिंदगी हो जाती आसान, करते रहे धर्म प्रभावना- दर्शनप्रभाजी म.सा.
  • रूप रजत विहार में नियमित चातुर्मासिक प्रवचन

भीलवाड़ा 28 जुलाई (निलेश कांठेड़) । चातुर्मास हमे धर्म से जुड़ने का अवसर प्रदान करता है इसे व्यर्थ में नहीं गवाना चाहिए। धर्मसाधना ही एक मात्र मार्ग है जो हमारे कर्मो की निर्जरा कर हमारा आत्मकल्याण कर सकती है। हमे भले कितने भी व्यस्त हो लेकिन धर्म आराधना के लिए समय निकालना ही चाहिए। जिनवाणी श्रवण का अवसर बार-बार नहीं मिलता है। ये विचार भीलवाड़ा के चन्द्रशेखर आजादनगर स्थित रूप रजत विहार में शुक्रवार को मरूधरा मणि महासाध्वी श्रीजैनमतिजी म.सा. की सुशिष्या महासाध्वी इन्दुप्रभाजी म.सा. ने नियमित चातुर्मासिक प्रवचन में व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि यहां जो जिनवाणी श्रवण का लाभ ले रहे है वह भाग्यशाली श्रावक-श्राविकाएं है। इससे होने वाले लाभों की कल्पना भी हम नहीं कर सकते है। कुछ लाभ हमे प्रत्यक्ष दिखते है ओर कुछ केवल महसूस कर सकते है। उन्होंने जैन रामायण के विभिन्न प्रसंगों की चर्चा करते हुए बताया कि गलत प्रवृतियों में लीन होने पर उसके दुष्परिणाम हमे भोगने ही पड़ते है। धर्मसभा में मधुर व्याख्यानी दर्शनप्रभाजी म.सा. ने कहा कि हम जितना धर्म से जुड़ते जाएंगे जिंदगी उतनी ही आसान होती जाएगी ओर जितना दूर जाने का प्रयास करेंगे जिंदगी की राह उतनी ही कठिन व दुर्गम होती जाएगी। हम चाहते है हमारा जीवन सुखमय निकले ओर हम अपने कर्मो की गति सुधार सके तो धर्म की निरन्तर प्रभावना करते रहे। उन्होंने कहा कि जिनवाणी नियमित सुनने का अवसर नहीं छोड़े। जो लोग अब तक किसी भी कारण से नहीं आ रहे उन्हें भी भगवान की वाणी श्रवण करने के लिए जोड़ने का प्रयास करें। कई बार हमे महसूस होता है जिंदगी हमारे मनमाफिक नहीं चल रही है। इसके कारण को टटोलेंगे तो पता चलेगा कि हम धर्म व भक्ति से दूर होकर सांसारिक मोह माया में डूब गए है। धर्मसभा में तत्वचिंतिका डॉ.समीक्षाप्रभाजी म.सा. ने सुखविपाकसूत्र का वाचन करते हुए श्रावक के 12 व्रतों के बारे में चर्चा करते हुए समझाया कि व्रत अंगीकार कर व्रति श्रावक बनना चाहिए। उन्होंने कहा कि जीवन में व्रत रूपी मर्यादा रखने से जीवन सुगम व सहज होता जाएगा ओर हम असीम आध्यात्मिक व आत्मीय आनंद की अनुभूति करेंगे। उन्होंने कहा कि स्वयं भी व्रति श्रावक बनने के साथ दूसरों को भी ऐसा करने की प्रेरणा देकर हम धर्म दलाली का लाभ प्राप्त कर सकते है। धर्मसभा में आगम मर्मज्ञा डॉ. चेतनाश्रीजी म.सा., आदर्श सेवाभावी दीप्तिप्रभाजी म.सा.,नवदीक्षिता हिरलप्रभाजी म.सा. का भी सानिध्य प्राप्त हुआ। अतिथियों का स्वागत श्री अरिहन्त विकास समिति द्वारा किया गया। धर्मसभा में शहर के विभिन्न क्षेत्रों से आए श्रावक-श्राविका बड़ी संख्या में मौजूद थे। धर्मसभा का संचालन श्रीसंघ के मंत्री सुरेन्द्र चौरड़िया ने किया। चातुर्मासिक नियमित प्रवचन प्रतिदिन सुबह 8.45 बजे से 10 बजे तक हो रहे है।
रविवार को बच्चों के लिए दया तप की आराधना
चातुर्मास के तहत रविवार को बच्चों के लिए दया तप की आराधना होगी। इसके माध्यम से उन्हें धर्म से जुड़ इसकी आराधना के लिए प्रेरित किया जाएगा। रविवार को ही सुबह 8 से 8.30 बजे तक युवाओं की कक्षा होगी। दोपहर 3 से 4 बजे तक प्रश्नमंच का आयोजन होगा। धर्मसभा में बताया गया कि चातुर्मासकाल में प्रतिक्रमण कठंस्थ करा सुना देने वाले बच्चें को गुप्त सहयोगी की ओर से 11 हजार रूपए का प्रोत्साहन पुरस्कार दिया जाएगा। इसी तरह प्रतिक्रमण कंठस्थ कर सुनाने वाले अगले तीन बच्चों को सुश्रावक नवरतन बापना की ओर से 2100-2100 रूपए का प्रोत्साहन पुरस्कार दिया जाएगा। चातुर्मास के तहत रविवार से ही 18 वर्ष तक के बच्चों के लिए 15 दिवसीय द्रव्य मर्यादा तप (चन्द्रकला तप) शुरू करने की भावना है। ये ऐसी तप साधना होगी जो बच्चें स्कूल-कॉलेज जाते भी आसानी कर सकेंगे। इस साधना के तहत बच्चों के लिए द्रव्य मात्रा निर्धारित होगी यानि वह एक दिन में उस तय द्रव्य मात्रा से अधिक द्रव्यों का उपयोग नहीं कर सकेंगे। दैनिक दिनचर्या में जरूरी चार चीजों पानी पेस्ट, दूध व दवा की छूट (आगार) रहेगी। तप के तहत पहले दिन अधिकतम 15 द्रव्य उपयोग में लेे सकेंगे। इसी तरह निरन्तर घटते क्रम में तप साधना के अंतिम दिन 13 अगस्त को एक द्रव्य का ही उपयोग कर सकेंगे। समिति के अध्यक्ष राजेन्द्र सुकलेचा के अनुसार चातुर्मास के तहत प्रतिदिन सूर्योदय के समय प्रार्थना का आयोजन हो रहा है। प्रतिदिन दोपहर 2 से 3 बजे तक नवकार महामंत्र जाप एवं दोपहर 3 से 4 बजे तक साध्वीवृन्द के सानिध्य में धार्मिक चर्चा हो रही है।