रतलाम, 28 जुलाई। अभ्युदय चातुर्मास में परम पूज्य, प्रज्ञा निधि, युगपुरूष, आचार्य प्रवर 1008 श्री विजयराजजी मसा अपनी अमृतवाणी ने प्रयास कर रहे है कि सब सन्मति को प्राप्त हो और दुर्मति से मुक्त हो जाए। दुर्मति से मुक्त होने पर भाग्यवान बन जाओगे। आज का भाग्यवान ही कल का भगवान है। आचार्यश्री सबकों भविष्य का भगवान बनाना चाहते है।
यह बात उपाध्याय प्रवर, प्रज्ञारत्न श्री जितेश मुनिजी मसा ने कही। शुक्रवार को छोटू भाई की बगीची में प्रवचन देते हुए उन्होंने कहा कि आचार्य प्रवर दुर्मति के जो दोष बता रहे है। उनसे बचने का प्रयास करोगे, तभी सन्मति को प्राप्त हो सकोगे। सन्मति से सदगति मिलना निश्चित है।
उपाध्याय प्रवर ने सब प्रकार की हिंसा से बचने का आव्हान करते हुए कहा कि कर्मों का हिसाब हर हाल मेें होकर रहता है। जमीन पर रहो, पाताल में रहो अथवा अंतरिक्ष में रहो, किसी भी जगह ये कर्म पीछा छोडने वाले नहीं है। यदि दंड से बचना है, तो अपनी आत्मा को हिंसा से बचाओं। वर्तमान में लोग तरह-तरह की हिंसा करते है, जो उचित नहीं है। भारत-पाकिस्तान के मैच में हार-जीत पर पटाखे फोडना कहां उचित है। इससे असंख्य जीवों की हिंसा होती है और धुंआ भी निकलता है। अनजाने मंे लोग खुशियों के बहाने मौत बांटने का काम करते है, तो उन्हें इसका फल भोगना ही पडता है।
उन्होंने कहा कि अहिंसा से हमारा जीवन जगत के लिए मंगलमय वरदान बनता है। इसलिए सबकों तय करना चाहिए कि अपने जीवन को वरदान बनाना है अथवा जगत के लिए अभिशाप बनना है। परमात्मा ने सबकांे अभय और जीवन दान देने का संदेश दिया है। जीओ और जीने दो के मंगलकारी आचरण से ही हम अपने जीवन को सार्थक कर सकते है। प्रवचन के दौरान कई श्रावक-श्राविकाएं उपस्थित रहे।
तेले के तप से सेवादार ने की अनुमोदना
आचार्य प्रवर श्री विजयराजजी मसा की प्रेरणा से अभ्युदय चातुर्मास त्याग और तप की झडी लगी हुई है। तरूण तपस्वी श्री युगप्रभजी मसा द्वारा 33 उपवास की दीर्घ तपस्या की अनुमोदना हेतु शुक्रवार को उनकी सेवा में लगे कमलेश ने तेले की तपस्या के प्रत्याख्यान लिए। इधर सेवानिष्ठ, एकान्तर तप के तपस्वी श्री जयमंगल मुनिजी मसा ने 30 उपवास और विद्यावाग्नी महासती श्री गुप्तिजी मसा ने 27 उपवास के प्रत्याख्यान लिए। तपस्विनी, सेवागुण संपन्न महासती श्री निरूपणाश्री मसा की भी 18 उपवास की तपस्या चल रही है।