रतलाम,06 अगस्त। प्रेम में मित्रता है, प्रेम में पवित्रता है, प्रेम में प्रसन्नता है। मित्रता, पवित्रता और प्रसन्नता ये सबसे बडी संपत्ति है। हमारा प्रेम इस संपत्ति को लगातार बढाने वाला होना चाहिए, क्योंकि प्रेम में ही सबकुछ है। आजकल लोग रबर बैंड बांधकर और गुलाब के फूल देकर प्रेम जताते है, लेकिन इससे प्रेम नहीं होता, वह तो अटूट रहता है। जो शक्ति प्रेम में है, वह बैर में नहीं है।
यह बात परम पूज्य, प्रज्ञा निधि, युगपुरूष, आचार्य प्रवर 1008 श्री विजयराजजी मसा ने सिलावटों का वास स्थित नवकार भवन में कही। रविवार को चातुर्मासिक प्रवचन के दौरान दुर्मति के आठवें दोष बैर भाव से सदैव दूर रहने पर जोर देते हुए उन्होने कहा कि बैर तीन कारणों अहम, आग्रह और आवेश से पैदा होता है। अहम,आग्रह और आवेश तीनों बुरे है, ये जानते हुए भी जब व्यक्ति इनका त्याग नहीं करता, तो उसकी समझ पर सवालिया निशाल लग जाते है। समझ वहीं सही है, जो बुराईयों का त्याग करे और अच्छाइयों को तत्काल ग्रहण कर लेती है।
आचार्यश्री ने कहा कि जीवन प्रेम से महान बनता है, बैर से कभी नहीं बनता। संसार में जितने भी महापुरूष हुए है, उन्होंने प्रेम और आत्मीयता का अनुसरण करके ही अपने मुकाम हासिल किए है। बैरभाव बहुत खतरनाक है। इससे व्यक्ति सदैव अशांत और असंतुष्ट रहता है। बैर का जीवन बहुत ही निकृष्ठ जीवन है। इससे परे रहने वाला ही उत्कृष्ठ जीवन जीता है। केंसर की बिमारी में जैसे व्यक्ति घुटता है, वैसे ही बैर में भी घुटता है। इसलिए बैर भाव का त्याग करना आवश्यक है।
आचार्यश्री ने कहा कि प्रेम स्वर्ग है और बैर नर्क है। व्यक्ति जब ये समझ जाएगा, तो प्रेम का होना ही उसे जीवन में स्वर्ग का अनुभव कराएगा। प्रेम निडर बनाता है, जबकि बैर रखने वाला सदैव भयभीत और भ्रमित रहता है। पारिवारिक जीवन में खुश रहने के लिए प्रेम की प्रतिष्ठा अवश्य करना चाहिए। आरंभ में उपाध्याय प्रवर, प्रज्ञारत्न श्री जितेश मुनिजी मसा ने आचारण सूत्र का वाचन किया। विद्वान सेवारत्न श्री रत्नेश मुनिजी मसा ने भाव व्यक्त किए। इस दौरान बडी संख्या में श्रावक-श्राविकागण उपस्थित रहे।