जीवन के प्लाट में मर्यादा की बाउंड्री रखना जरूरी है

आचार्य श्री विजय कुलबोधि सूरीश्वरजी म.सा. ने चौथे युवा शिविर में 2500 से अधिक युवाओं के हदय परिर्वतन का किया प्रयास

रतलाम, 6 अगस्त। सफल वह होता है, जिसे टूटे को बनाना और रूठे को मनाना आता है। समय तो सबके पास है लेकिन उस समय में क्या करना है यह सबको नहीं पता। यदि हमें ऑल इज वेल चाहिए तो ।ए ठए ब्ए क्ए म् को सीखना होगा। जिसमें । से अवॉइड एंगल, ठ से बाउंड्री इज एसेंशियल, ब् से चेंज योर नेचर, क् से डोंट से नो और म् से एकस्पोंड योर लाइफ, यदि जीवन में यह समझ लिया तो सब कुछ ऑल इज वेल होगा।
यह बात आचार्य श्री विजय कुलबोधि सूरीश्वरजी म.सा. ने सैलाना वालों की हवेली, मोहन टॉकीज में चौथे युवा शिविर में कहीं। उन्होंने कहा कि चिंता घुन की तरह हमें खत्म कर देती है और गुस्से से हमारी स्मरण शक्ति और नेत्रों की ज्योति कम होती है। एक बार गुस्सा करने से दिमाग की 10 हजार कोशिकाएं खत्म हो जाती है। गुस्से में बैलेंस नहीं रहता है और संबंध टूट जाते हैं। दुनिया कहती है, गुस्से से संबंध खत्म हो जाता है। साइंस कहता है, स्वास्थ्य खराब हो जाता है। और प्रभु कहते हैं कि गुस्से से जीवन की सुख शांति खत्म हो जाती है। गुस्सा दुर्गति का कारण है। यदि सहनशक्ति बड़ी तो कोई तकलीफ नहीं होगी।
आचार्य श्री ने कहा कि हमारे जीवन के प्लाट में मर्यादा की बाउंड्री रखना जरूरी है। नदी को किनारे का, सुई को धागे का, पैसे को पॉकेट का बंधन है। ठीक ऐसे ही बहू को सास का, पुत्र को पिता का, पत्नी को पति का और शिष्य को गुरु की मर्यादा होना चाहिए। आज अपराध बढ़ने का कारण भी मर्यादा का बंधन खत्म होना है। मोबाइल, मॉल और मल्टीनेशनल कंपनियों ने हमारी मर्यादा को खत्म कर दिया है। आज इंसान कैरियर लेस नहीं, कैरक्टर लेस हो गया है। पहले हम ज्वेलरी छुपाते थे, आजकल मोबाइल की गैलरी छुपाते हैं।
आचार्य श्री ने कहा कि हम अपने नेचर को ठीक करें तो फ्यूचर ठीक हो जाएगा। कपड़े बदल कर साधु बनना आसान है लेकिन स्वभाव को बदलकर साधु बनने में जिंदगी गुजर जाती है। जीवन में अहम और वहम राहु-केतु के समान है। कुछ बड़े होने के अहम में मर गए और जो बड़े थे वह वहम में मर गए। प्रभु के सामने जो झुकता है वह अच्छा लगता है लेकिन जो सबके सामने झुकता है, वह सबको अच्छा लगता है।
आचार्य श्री ने कहा कि कभी किसी को ना मत बोलिए। संपूर्ण प्रकृति में ना शब्द नहीं है। नदी पानी को, पेड़ फल को, सूर्य प्रकाश को, चांद चांदनी को और फूल खुशबू को हां बोलते हैं लेकिन एकमात्र इंसान है जो ना बोलते हैं। समय देने में, शब्द बोलने में, संपत्ति और समझ देने में कभी ना मत बोलिए। प्रेम सबसे निंदनीय और प्रशंसनीय शब्द है। परमात्मा और गुरु के प्रति प्रेम वंदनीय है और जहां नहीं करना है, वहां करो तो निंदनीय है। प्रभु ने प्रेम को एक्स्पोंड किया है।
2500 से अधिक युवा शिविर में हुए शामिल
श्री देवसूर तपागच्छ चारथुई जैन श्रीसंघ गुजराती उपाश्रय, श्री ऋषभदेवजी केशरीमलजी जैन श्वेताम्बर तीर्थ पेढ़ी द्वारा के तत्वावधान में आयोजित चौथे युवा शिविर में 2500 से अधिक युवा एवं श्रावक-श्राविकाएं उपस्थित रहे। शिविर के लाभार्थी विधायक चेतन्य काश्यप एवं परिवार रहा। शिविर में मुंबई बोरीवली के संगीतकार जैनम ने सुमधुर भजनों की प्रस्तुतियां दी गई।