मैत्री उंगली और आंख जैसी होना चाहिए- आचार्य श्री विजय कुलबोधि सूरीश्वरजी म.सा.

तपस्वियों के भव्य जुलूस और सत्कार समारोह का आयोजन होगा

रतलाम, 17 अगस्त। मनुष्य जन्म बहुत दुर्लभ है। इसे सुलभ बनाना है,तो उसके तीन विकल्प- सत्याग्रही, सारग्राही और सर्वग्राही बनना है। मैत्री उंगली और आंख जैसा होना चाहिए। उंगली को चोट लगे तो आंख रोती है और आंख से आंसू गिरे तो उंगली पोंछती है।
यह बात आचार्य श्री विजय कुलबोधि सूरीश्वरजी म.सा ने मोहन टाकीज, सैलाना वालों की हवेली में कही। उन्होंने कहा कि भले ही आप असत्य के जगत में या असत्य के माहौल में हो, यदि सत्य का पक्षपात होगा तो भी सफल है। वही धर्म की प्रवृत्ति भले न हो लेकिन धर्म का पक्षपात होना आवश्यक है।
आचार्य श्री ने कहा कि घटना जैसी भी हो उसमें सार ग्रहण करके इससे प्रभावित नहीं होना चाहिए, आगे बढ़ना चाहिए। सभी को स्वीकार करना है और किसी को माइनस नहीं करना है ,जो यह काम करता है, वह प्रगति के पथ पर अग्रसर होता है।
आचार्य श्री विजय कुलबोधि सूरीश्वरजी म.सा. की निश्रा में 18 अगस्त को दूसरे दौर के वर्धमान तप के पाया के तपस्वियों का भव्य जुलूस निकलेगा | इसके बाद सत्कार समारोह आयोजित होगा। दूसरे दौर में 280 तपस्वी शामिल है। इनका जुलुस संघवी संपतबाई मेघराज कटकानी के नीम चौक स्थित निवास से प्रातः 8.15 बजे निकलेगा और मुख्य मार्गो से गुजरकर मोहन टॉकीज में सत्कार समारोह के रूप में परिवर्तित हो जाएगा। श्री देवसूर तपागच्छ चारथुई जैन श्रीसंघ गुजराती उपाश्रय, श्री ऋषभदेवजी केशरीमलजी जैन श्वेताम्बर तीर्थ पेढ़ी ने धर्मावलम्बियों से अधिक से अधिक संख्या में उपस्थित रहने का आव्हान किया है |