- पर्यूषण महापर्व के छठे दिन समभाव का संदेश
- इच्छा सुखडम, मिच्छामी दुखडम पर प्रवचन
रतलाम,19 अगस्त। श्री हुक्मगच्छीय साधुमार्गी शान्त-क्रांति संघ के तत्वावधान में पर्यूषण महापर्व के छठे दिन परम पूज्य, प्रज्ञा निधि, युगपुरूष, आचार्य प्रवर 1008 श्री विजयराजजी मसा ने समभाव का संदेश दिया। उन्होने कहा कि हमारा लक्ष्य हर व्यवहार में समता का होना चाहिए। समता ही जीवन है, साधना है, संयम है, स्वर्ग है और मोक्ष है। समता धर्म का मूल है। इसे थामने वाले के जीवन में सारी विशेषताएं खुद आ जाती है।
आचार्यश्री ने इच्छामी सुखडम, मिच्छामी दुखडम विषय पर प्रवचन देते हुए कहा कि हर व्यक्ति दिन की शुरूवात इच्छामी सुखडम से करना चाहता है, लेकिन दिन को मिच्छामी दुखडम के साथ खत्म करना चाहिए। दिनभर में हुए ऐसे कार्यो के लिए समभाव से क्षमा की स्थिति होना चाहिए, जिनसे किसी को कष्ट पहुंचा हो। उन्होंने कहा कि समता से ही व्यक्ति आत्मा से महात्मा और बाद में महात्मा से परमात्मा बनता है। इसलिए हर कार्य में समता होना चाहिए।
आचार्यश्री ने कहा कि जिनशासन तीन बातों पर टीका है। एक-सम्मान, दूसरा-संयोग और तीसरा-सहयोग। सम्मान का भाव जब तक बना रहेगा, तब तक जिनशासन चलता रहेगा। इसकी तीन विशेषताएं भी है, पहली जीव मैत्री, दूसरी जिनभक्ति और तीसरा जीवन शुद्धि। इन्हें जो जीता है, उसका जीवन सार्थक हो जाता है। उन्होंने कहा कि सुख संसार की परीक्षा है, जबकि दुख धेर्य की परीक्षा होते है। संसार में धर्म के कार्य अविलंब करना चाहिए, क्योंकि विलंब से उनके परिणाम नहीं आते है। भविष्य के पास अनुभव नहीं होता और भूत के पास अवसर नहीं होते, लेकिन वर्तमान के पास दोनो होते है।
आचार्यश्री ने कहा कि द्वेष पुण्य, प्रशंसा और पवित्रता का नाश करता है। द्वेष इंसान को इंसान नहीं बनने देता और राग इंसान को भगवान नहीं बनने देता है। समता भाव में रहकर जीव मैत्री, जिन भक्ति और जीवन शुद्धि का लक्ष्य रखे। जीवन में जब तक ये लक्ष्य नहीं होगा, तब तक परिवर्तन नहीं आएगा। आरंभ में विद्वान संत श्री रत्नेशमुनिजी मसा ने आगम का वाचन किया। उपाध्याय प्रवर श्री जितेश मुनिजी मसा ने हाय बनाम सहाय विषय पर विचार रखे। महासती श्री मोहक प्रभाजी मसा ने 16 उपवास, सुश्राविका सुनीता बोहरा ने 23 उपवास के प्रत्याख्यान लिए। बालाघाट से आई आशा कांकरिया ने भी भाव व्यक्ति किए। इस दौरान सैकडों श्रावक-श्राविकाएं उपस्थित रहे।