मोहन बाग में हुए प्रवचन


रतलाम, 23 अगस्त। भक्त का हाथ भगवान पकड़ते हैं,तो वह भवसागर तर जाता है। इसलिए हमें जीवन में अपनी भूमिका तय करनी है कि हमें प्रभु का हाथ पकड़ना है या वह हमारा हाथ पकड़े, हम ऐसा काम करें। मनुष्य की मेंटालिटी है कि उसे सुख चाहिए, दुख नहीं।
यह बात आचार्य श्री विजय कुलबोधि सूरीश्वरजी म.सा. ने बुधवार को मोहन बाग में श्रेयांस नाथ जैन श्वेताम्बर मंदिर ट्रस्ट द्वारा आयोजित प्रवचन में कही। आचार्य श्री ने “नहीं एसो जन्म बार -बार ” विषय पर उन्होंने कहा कि हमारी मेंटालिटी होती है कि सुख चाहिए लेकिन रियलिटी है कि सुख के साथ दुख भी मिलेगा। दुनिया में आज तक ऐसा कोई व्यक्ति नहीं है जिसे सिर्फ सुख ही मिला हो, कभी दुख नहीं मिला। यदि मिठाई के साथ नमकीन पसंद है तो सुख के साथ दुख को भी पसंद करना होगा।
आचार्य श्री ने कहा कि हमे पाप का प्रतिकार करना है और पीड़ा को स्वीकार करना है। पीड़ा तो इस जन्म की है लेकिन पाप जन्म-जन्म के हैं। कैंसर की गांठ तो जल कर खत्म हो जाएगी लेकिन क्रोध की गांठ जन्म-जन्म तक रहेगी। क्रोध घर में ठीक है लेकिन धर्म स्थान पर नहीं। चाय को गर्म होने में समय लगता है लेकिन हमें गर्म होने में समय नहीं लगता है।
आचार्य श्री ने कहा कि पीड़ा सहन करने की ताकत हमें उसे स्वीकार करने में मिलती है। मानव जीवन की सार्थकता स्वीकार करने में ही है। हम सामना करने को तो राजी है लेकिन स्वीकार करने को नहीं, यह सबसे बड़ी समस्या है। आरम्भ में स्वागत यात्रा निकाली गई,जो अठ्ठम तप के लाभार्थी अखिलेश बोहरा से निकली | इसमें देवसूर तपागच्छ चारथुई जैन श्रीसंघ गुजराती उपाश्रय, श्री ऋषभदेवजी केशरीमलजी जैन श्वेताम्बर तीर्थ पेढ़ी के पदाधिकारी एवं सदस्य सहित बड़ी संख्या में श्रावक श्राविकाएं उपस्थित रहे।