रतलाम 24 अगस्त | मानव की बुद्धि अगर शुद्ध और परिष्कृत होती है तो जीवन सारा व्यवस्थित और नियमित होता है। बुद्धि का तंत्र ही मन और इन्द्रियों को परिचालित करता है। बुद्धि मेन स्वीच की तरह होती है। मेन स्वीच से विद्युत का प्रवाह जैसे सारे घर को प्रकाशित कता है, वैसे जीवन का हर कार्य बुद्धि से संचालित होता है। सम्यक ज्ञान बुद्धि को परिष्कृत रखता है।
यह बात छोटू भाई की बगीची में आयोजित धर्म सभा में आचार्य श्री विजयराजजी महाराज ने कही | उन्होंने कहा कि बुद्धि में शुद्धि जब भी आयेगी, वह सम्यक ज्ञान से ही आयेगी। सम्यक ज्ञान से बुद्धि में परिष्कार होता है | आचार्य श्री ने कहा – सम्यक ज्ञान की प्राप्ति होते ही व्यक्ति गुणों की ओर अभिमुख हो जाता है। यह अभिमुखता उसे गुणवान बना देती है। गुणवान पुण्यवान होते ही बिना गुणों को प्राप्त किये पुण्य सृजनात्मक नहीं बनता। सम्यक ज्ञान हर विसंगति में संगति और हर विकृति में संस्कृति का निर्माण करता है। शिक्षा अलग है। उसके लिए अनेक संस्थान है मगर ज्ञान की प्राप्ति सत्संग में ही होती है। ज्ञान से ध्यान और ध्यान से आत्म कल्याण का मार्ग प्रशस्त होता है।
आचार्य श्री ने कहा- आस्था के साथ अगर सत्संग और जिन वाणी का श्रणण किया जाए तो हर समस्या का समाधान मिलता है। विचार शुद्धि और बुद्धि की शुद्धि ये एक दूसरे की पूरक होती है। बिना विचार शुद्धि के बुद्धि शुद्ध नहीं होती और बुद्धि की शुद्धि के बिना विचार शुद्धि नहीं हो सकती। विचारों का वैषम्य ही विसंगतियों को पैदा करता है- जो सन्मति से दूर धकेल देता है।
उपाध्याय श्री जितेश मुनि जी मसा ने सम्यक, समय और शक्ति पर विवेचन किया। बचपन में समय और शक्ति होती है मगर सम्यक नहीं होती। यौवन में सम्यक होती है मगर समय नहीं होता, बुढ़ापे में शक्ति नहीं होती। इसलिए धर्म यौवन में ही करना चाहिए।धर्मसभा में तपस्या और अनेक त्याग के प्रत्याख्यान हुए।