तीन दु:ख: रोग, बुढ़ापा और मृत्यु इंसान का पीछा कभी नहीं छोड़ते- मुनिराज ज्ञानबोधी विजयजी म.सा.

रतलाम,25 अगस्त । महापुरुषों ने देव और मनुष्य दोनों गति को दुर्गति बताया है। उनका कहना है कि वहां भी सुख नहीं है। यदि हमें संसार में दु:ख नजर आए तो आश्चर्य नहीं लेकिन सुख नजर आए तो आश्चर्य है। दु:ख का नाम ही संसार है। तीन दु:ख- रोग, बुढ़ापा और मृत्यु ये हमेशा सबके पीछे पड़े रहते है।
यह बात आचार्य श्री विजय कुलबोधि सूरीश्वरजी म.सा के शिष्य मुनिराज ज्ञानबोधी विजयजी म.सा. ने सैलाना वालों की हवेली मोहन टाकीज में कहीं। मुनिराज ने कहा कि हमारे शरीर में 7 करोड़ रोग हो सकते है, लेकिन रोग होना आश्चर्य नहीं है, रोग न हो वह आश्चर्य है। रोग नहीं होना प्रभु की कृपा मानो।
मुनिराज ने कहा कि किसी भी पशु के दर्शन कर उसके सामने हाथ जोड़कर कहना की प्रभु मुझे अगले जन्म में यह नहीं बनना है। देव को भी अतृप्ति का दुख है, ईर्ष्या का दुख है, मरते समय व्योग का दुःख रहता है। वर्तमान दौर में हमारा खानपान बदल गया। हम व्यसन में जुड़ गए। पहले ऐसे रोगों के नाम हमने नहीं सुने थे लेकिन आज नए नए रोग हो रहे है।
श्री देवसूर तपागच्छ चारथुई जैन श्रीसंघ गुजराती उपाश्रय, श्री ऋषभदेवजी केशरीमलजी जैन श्वेताम्बर तीर्थ पेढ़ी के तत्वावधान में आयोजित प्रवचन में बड़ी संख्या में श्रावक श्राविकाएं उपस्थित रहे।