ज्ञान दिमाग में बोझ होता है, व्यवहार में आचरण बन जाता है-आचार्य प्रवर श्री विजयराजजी मसा

छोटू भाई की बगीची में चातुर्मासिक प्रवचन

रतलाम,27 अगस्त। परिवार के प्रति धेर्य रखना प्रेम है, दूसरों के प्रति धेर्य रखना सम्मान होता है। अपने प्रति धेर्य रखना आत्म विश्वास है और परम पद को प्राप्त परमात्मा के प्रति धेर्य आस्था होती है। धेर्य जीवन में तभी आता है, जब ज्ञान जीवन में उतरकर व्यवहार बनता है। ज्ञान दिमाग में बोझ होता है, लेकिन व्यवहार में आचरण बन जाता है।
यह बात परम पूज्य, प्रज्ञा निधि, युगपुरूष, आचार्य प्रवर 1008 श्री विजयराजजी मसा ने कही। छोटू भाई की बगीची में चातुर्मासिक प्रवचन देते हुए उन्होेंने कहा कि जीवन में सम्यक ज्ञान से बहुत बडी उपलब्धि धेर्यशीलता की मिलती है। महापुरूषों के अनुसार धेर्यशीलता, आराधना है और अधीरता विराधना है। धेर्यशीलता कभी भी सम्यक ज्ञान के बिना नहीं आती। धेर्य आता है, तब ज्ञान जीवन में उतरकर व्यवहार बन जाता हैं।
आचार्यश्री ने कहा कि ज्ञान ही जीवन है। इससे विनय, विवेक और वैराग्य आदि पैदा होते है। सीखा हुआ ज्ञान कभी परभव में साथ नहीं रहता, अपितु वही ज्ञान हर भव में साथ देता है, जो आचरण में लाया जाता है। ज्ञान से फलित धेर्य का भी दायरा बहुत बडा होता है। परिवार से शुरू होकर यह समाज, स्वयं और परमात्मा पर जाकर खत्म होता है। सम्यक ज्ञान, सन्मति का पहला गुण है। इससे व्यक्ति आत्मा से महात्मा और फिर परमात्मा बन सकता हैं।
आरंभ में उपाध्याय प्रवर श्री जितेश मुनिजी मसा ने आचारण सूत्र का वाचन करते हुए जीवन में दो लक्ष्य आत्मा का हित और जिनशासन की सेवा रखने का आव्हान किया। उन्होंने तप, त्याग के क्षेत्र में आगे बढने पर जोर देते हुए कहा कि इससे संयम प्रबल होता है। एक छोटा सा त्याग भी जीवन में संयम को मजबूत करता है। उपाध्यायश्री की प्रेरणा से कई श्रावक-श्राविकाओं ने आचार्यश्री से तप-त्याग के प्रत्याख्यान लिए। महासती श्री मोहकप्रभाजी मसा ने 24 उपवास एवं सुश्राविका सुनीता बोहरा ने 31 उपवास के प्रत्याख्यान लिए। महासती श्री चिंतनप्रज्ञाजी मसा ने 8 उपवास के प्रत्याख्यान ग्रहण किए। धर्मसभा में सैकडों श्रावक-श्राविकाएं उपस्थित रहे।

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