रतलाम । आचार्य श्री रामलाल जी म सा के आज्ञानुवर्ती शासन दीपक आदित्य मुनि जी महाराज साहब ने प्रवचन में फरमाया कि संयमी आत्मा कर्मों को हल्का कर गुरु की आज्ञा अनुसार दमन कर सकती है, अगलान भाव से सेवा कर सकती है, आहो भाव रखते हुए सेवा करते समय वह यह सोचते हैं कि यह मेरा उदय कर्म आना चालू हो गया है , यह मेरे पाप को कम कर पुण्य की ओर ले जाएगा क्योंकि पाप और पुण्य दोनों ही क्रिया है परंतु क्रिया समान होने के पश्चात भी भावों में अंतर है उसी से पता लगता है की कौन सयमि है और कौन असयमी । हम जब अज्ञानतापूर्वक कोई कार्य करते हैं तो वह हमारे लिए हानि कारक होता है परंतु निर्णय उससे होता है कि उस समय हमारा भाव क्या था साधु और श्रावक के भी इसी प्रकार लक्षण समान है ,जब-जब मन में विकार की भावना आए सिद्धों की आत्मा से मेरा तार जुड़ जाना चाहिए ऐसा हमारा निर्मल भाव बने यही सोच पूरे जीवन भर हमारे साथ चलनी चाहिए। संयमी जीवन जीने के लिए कोई उम्र का बंधन नहीं कोई समय निश्चित नहीं क्योंकि पास्ट हमारे हाथ से जा चुका है प्रेजेंट को हमें परम सेवा भाव में जोड़ना है और फ्यूचर में जब हम कोई कार्य करने में अक्षमता की स्थिति में होंगे तब हमें सिर्फ श्रमा भाव लेकर चलना है यह सभी कार्य सयमी व्यक्ति ही कर सकता है। श्री अटल मुनि जी महाराज साहब ने भी प्रवचन के माध्यम से अपने भाव गुरु के प्रति समर्पण हेतु रखें उपरोक्त जानकारी देते हुए श्री साधुमार्गी जैन संघ के प्रीतेश गादिया ने बताया कि कई श्रावक श्राविकाओं के तपस्या गतिमान है उनकी तपस्या की अनुमोदना करने के लिए नीतू मुरार ने अपने भाव प्रस्तुत किये। रायपुर दुर्ग आदि कई स्थान से पधारे अतिथियों का शाब्दिक स्वागत मंत्री दशरथ बाफना द्वारा किया गया व अहो भाव वंदन रितेश नागोरी ने रखें।