जीवन के पांच कलंक पीड़ा, पतन, प्रलोभन, पराजय, पराधीनता- आचार्य श्री विजय कुलबोधि सूरीश्वरजी म.सा.

रतलाम, 2 सितंबर। संसार की एक ही परिभाषा है और वह निरंतर भटकते रहना है। कभी मनुष्य, देव, पशु तो कभी किसी और भव में उसे भटकना ही पड़ता है। यदि हमने ब्राहय संसार को छोड़ दिया और अभयंतर संसार को नहीं छोड़ा तो हम कहीं के नहीं रहेंगे। जीवन के पांच कलंक पीड़ा, पतन, प्रलोभन, पराजय और पराधीनता है।
यह बात आचार्य श्री विजय कुलबोधि सूरीश्वरजी म.सा. ने सैलाना वालों की हवेली मोहन टाकीज में कही। आचार्य श्री ने कहा कि संसार के यदि इन पांच कलंक को आपने देख लिया तो संसार छोड़ने में देर नहीं लगेगी। शरीर की पीड़ा में तरह-तरह के रोग होते है। जीवन में एक बार तो मनुष्य को रोग की पीड़ा भुगतना ही पड़ती है। 21वीं सदी में डाक्टर, दवा, बीमारियां सब बढ़ी है। बीमारियां कम करना है तो अपनी थालियां गिन लो। आहार संयम जरूरी है। रात के भोजन को कम कर दो। हमे जितनी भूख हो उससे थोड़ा कम खाना चाहिए।
आचार्य श्री ने कहा पूनम और अमावस्या में तो 15 दिन का अंतर होता है लेकिन पतन और उत्थान के बीच पांच सेंकड का भी अंतर नहीं होता है। जीवन सांप-सीढ़ी का खेल है। शुभ निमित सीढ़ी है, जिसे पकड़कर ऊपर जाना होता है। अशुभ निमित हमें नीचे लाता है। हमे शुभ निमित को अवॉइड करना चाहिए और अशुभ निमित को इनवाइट नहीं करना चाहिए। संसार में कई लोग प्रलोभन में उलझकर रह जाते है। रावण बहुत बलशाली था लेकिन उसकी पराजय हुई। इंसान का शरीर और परिवार की पराधीनता रहती है।
आचार्य श्री विजय कुलबोधि सूरीश्वरजी म.सा की निश्रा में सैलाना वालों की हवेली मोहन टॉकीज में दो रविवारीय चैलेंज यूथ विशेष शिविर आयोजित होगा। 16 से 30 वर्ष तक के युवक-युवतियों के लिए 3 सितंबर, रविवार को दूसरा शिविर लगेगा। इसका लाभार्थी जैन सोश्यल ग्रुप मैत्री परिवार रहेगा। शनिवार को प्रवचन के दौरान श्री देवसूर तपागच्छ चारथुई जैन श्रीसंघ गुजराती उपाश्रय, श्री ऋषभदेवजी केशरीमलजी जैन श्वेताम्बर तीर्थ पेढ़ी के सदस्यों सहित बड़ी संख्या में श्रावक श्राविकाएं उपस्थित रहे।