आज के वैज्ञानिक युग में मनुष्य ही मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु बन रहा है – पूज्य गुरुदेव श्री अरुणमुनि जी म.सा.

रतलाम। श्री वर्धमान स्थानकवासी जैन श्रावक संघ नीमचौक पर पर्युषण महापर्व का तृतीय दिवस प्रवचनकार पूज्य गुरुदेव श्री अरुणमुनि जी म.सा. ने अपने प्रवचन में मानव जीवन महान क्यों के विषय में बताया कि मानव को महान क्यों कहा जाता है जबकि शारीरिक बल में मनुष्य से अधिक बलवान भैंसा और सिंह होते है, विशालता में हाथी विशाल होता है, शुतुरमुर्ग भी इंसान से बलवान होता है और बहुत तेज चल सकता है, वनमानुष इतना बलशाली होता है की तेंदुए को उठाकर फैंक सकता है।
मनुष्य तो पराधीन है आदि, व्याधि और उपाधि से घिरा हुआ है। एक छोटी जहरीली फुंसी इंसान की जान ले सकती है। एक कहावत है शरीरम व्याधि मन्दिरम । शरीर में साढ़े तीन करोड़ रोम छिद्र है। और एक एक रोम में एक दो एक दो रोग छुपे हुए है।
पहलवान को अपने बल पर अहंकार होता है, लेकिन एक साधारण मच्छर उस जीवन को समाप्त करने के लिये काफी है । रूप में भी कई जीव मनुष्य से ज्यादा रूपवान है। पशुओं से मनुष्य की तुलना की जाती है, जैसे की गजगामिनी, मृगनयनी, गजकेसरी आदि। मानव का भरापूरा परिवार भी मनुष्य के लिये कोई गर्व की बात नही है, क्योंकि एक सर्पिणी, मछली आदि जीव भी एक साथ सैकड़ो अंडे दे देते है।
इन सबके बावजूद भी मनुष्य सर्वश्रेष्ठ है क्योंकि उसके पास शक्ति और बुद्धि का संतुलन है, मनुष्य सदैव विकासशील रहता है, मोक्ष प्राप्ति के लिये भी मनुष्य जन्म आवश्यक है। लेकिन मनुष्य में एक प्रवत्ति बहुत खराब होती है, अपने स्वार्थ के वशीभूत होकर वो धोखेबाज हो जाता है, उस वक्त वो सारे रिश्ते नाते भूल जाता है। आज के वैज्ञानिक युग में मनुष्य ही मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु बन रहा है घातक हथियारों का गलत इस्तेमाल भयंकर विनाश का कारण बन रहा है।
अगर मनुष्य यह प्रवृत्ति को छोड़कर सद्गुणों को अपना ले तो उसका जीवन महान बन सकता है। मोक्ष प्राप्त करने का अधिकार भी मनुष्य को है। मानव से महामानव बनने के लिये मानवता को धारण करना होगा, अपने अंदर की अच्छी शक्तियों को जागृत करके मनुष्य संसार का सर्वश्रेष्ठ प्राणी बन सकता है। सुबुद्धि, कुलीनता, सहयोग, यथाशक्ति दान, कृतज्ञता ये मनुष्य की मूल निधियां है। इन निधियों को जागृत करके मनुष्य अपने जीवन को महान बना सकता है। इसलिये मानव जीवन को महान बताया गया है ।