स्वर्ग के लोभ और नर्क के भय से धर्म करना समझदारी नहीं -आचार्य प्रवर श्री विजयराजजी मसा

छोटू भाई की बगीची में प्रवचन

रतलाम,30 सितंबर। मानव जीवन अनमोल है। हमसे ज्यादा बलवान और बुद्धिमान पशु जगत के लोग हो सकते है, लेकिन इसके बाद भी मानव जीवन को महत्वपूर्ण बताया गया है, क्योंकि इसी जीवन में आंतरिक शत्रुओं पर विजय पाई जा सकती है। दूसरे जीव के लिए ये संभव नहीं है। धर्म कभी स्वर्ग के लोभ या नर्क के भय से नहीं करना चाहिए। धर्म का लक्ष्य आत्म कल्याण का होना चाहिए।
यह बात छोटू भाई की बगीची में परम पूज्य, प्रज्ञा निधि, युगपुरूष, आचार्य प्रवर 1008 श्री विजयराजजी मसा ने कही। शनिवार को चातुर्मासिक प्रवचन के दौरान प्रलोभन पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने कहा कि प्रलोभन की दुनिया में छलावे ही छलावे और धोखे ही धोखे होते है। संसार में जो प्रलोभन को जीत लेता है, वह बहुत बडा साधक होता है। प्रत्येक व्यक्ति को जीवन में प्रलोभन को जीतने का लक्ष्य रखकर अपने अंदर ज्ञान का प्रकाश जगाना चाहिए। क्योंकि ज्ञान का प्रकाश होने पर बाहर के प्रलोभन आकर्षित नहीं कर पाते है।
आचार्यश्री ने कहा कि सबको प्रलोभन को जीतने की साधना करनी चाहिए। लेकिन आजकल बहुत लोग स्वर्ग प्राप्त करने अथवा नर्क के भय से धर्म करते है। स्वर्ग और नर्क की ये मानसिकताएं सही नहीं है। हमारा धर्म अति विशिष्ट है, इसके माध्यम से मोक्ष की प्राप्ति की जा सकती है। धर्म सदैव आत्मा के कल्याण के लिए होना चाहिए। इसे स्वर्ग और नर्क से जोडना ठीक नहीं है। स्वर्ग के प्रलोभन और नर्क के डर से धर्म करना समझदारी नहीं है। उन्होंने कहा कि दवा जैसे परिणाम देती है, वैसे ही धर्म भी परिणाम देता है। इसलिए धर्म का लक्ष्य हमेशा आत्मा का कल्याण रखना चाहिए। आरंभ में उपाध्याय प्रवर श्री जितेश मुनिजी मसा ने आचारंग सूत्र पर प्रकाश डाला। महासती श्री इन्दुप्रभाजी मसा ने 12 उपवास के प्रत्याख्यान लिए। इस दौरान बडी संख्या में श्रावक-श्राविकाएं उपस्थित रहे।