115 वी जन्म जयन्ती पर विशेष प्रस्तुति – विजय कुमार लोढ़ा निम्बाहेड़ा ( पूणे)

जैन दिवाकर परम्परा के महान सन्त मेवाड भूषण पूज्य गुरुदेव श्री प्रताप मल जी म.सा मेवाड़ की माटी देवगढ में संवत 1965 की आश्वीन कृष्णा सप्तमी को जन्में , पिता श्री मोड़ी राम जी गांधी एवम मातुश्री परम धीरा अखण्ड सौभाग्यवती श्रीमति दाखा बाइ , कम उम्र में माता – पिता का विछोह ,बचपन में जब जैन दिवाकर जी म.सा देवगढ पधारे तब वैराग्य भावना प्रस्फुटित हुई कालान्तर में लगभग 14 वर्ष की अवस्था में संवत 1979 की मगसर शुक्ला पूर्णिमा को मन्दसौर में वादीमान मर्दक गुरुदेव श्री नन्द लाल जी म.सा के पावन सानिध्य में दीक्षा ग्रहण की व उनके शिष्य बने।
दीक्षा ग्रहण करने के बाद बहुत अध्ययन किया कइ भाषाओ का आपको ज्ञान था आपका विचरण क्षेत्र भी काफी रहा आपने राजस्थान , मध्यप्रदेश के अतिरिक्त गुजरात , महाराष्ट्र , आन्ध्रप्रदेश, उत्तर प्रदेश, बिहार आदि सुदुर क्षेत्रो मे विचरण किया व धर्म प्रचार किया । आपकी प्रेरणा से कई संस्थाओं व स्थानको का निर्माण हुआ जिसमें प्रमुख इन्दोर के पिपली बाजार में बनी संस्था सेवा सदन प्रमुख है ।
वर्धमान स्थानक वासी जैन श्रावक संघ बड़ीसादड़ी ने संवत 2029 के वर्षवास मे आपको मेवाड भूषण की उपाधी से तथा संवत 2033 में भुसावल ( महाराष्ट्र) में धर्म सुधाकर की उपाधी से अलंकृत किया गया ।
आपमें सन्तो को साथ में रखने की व निभाने की जबरदस्त कला थी सदैव मुस्कराते हुए रहने वाले मुनिश्री संघ व सम्प्रदाय के लिए स्तंभ के रूप मे रहे सदैव परम्परा व संगठन के लिए तत्पर रहे व अपनी तरफ से शान्त व गम्भीर रहते हुए संघ का गौरव बढ़ाया व हमेशा जैन दिवाकर गुरुदेव श्री चौथमल जी म.सा के प्रति पूर्ण आस्थावान व समर्पित रहे ! जब कभी संघ व सम्प्रदाय के लिए विशेष स्थानो पर चातुर्मास करना आवश्यक था वो तत्पर रहते जिसमें जोधपुर , मन्दसोर , बडी सादडी आदि क्षेत्र हे जहा उन्होने समय परिस्थिती के अनुसार चातुर्मास किया ! ओर अपनी ओर से सदैव प्रेम का वातावरण रखा ! वे कैसी भी परिस्थिती में संघ एक्यता , संघ में प्रेम , श्रावको में प्रेम बढ़े सदैव एसा कार्य करते थे तथा बहुत ही मधुर भाषा का प्रयोग करते थे! वह जंहा भी चातुर्मास होता चाहे शेष काल में विचरण होता संघ के सभी सदस्यों से अपनत्व व प्रेम पूर्ण भाषा में बातचीत करते! उनका सदा यह मानना रहा कि सन्त वह हे जो अपने प्रवचन से अपने प्रयास से संघ में समाज में कोई विवाद हो उसे समाप्त कर दें! ओर कह बार उन्होंने एसे प्रयास किया! और कभी विषम परिस्थिती उत्पन्न होने पर मध्यस्थ भाव रखते थे! इस ही कारण उनके लम्बे विचरण क्षेत्र में व दीर्घ संयम यात्रा में प्रेम की गंगा बहाई!
संवत 2037 की भादवा कृष्णा एकम को उदयपुर में संथारा संलेखना के साथ देवलोक गमन हुआ ! उस समय उपाध्याय श्री पुष्कर मुनि जी म.सा. श्री देवेन्द्र मुनि जी म.सा.( जो बाद में आचार्य बने) आदि सन्त मंडल एवम मालव सिंहनी श्री कमला वती जी आदि महासती मंडल उदयपुर में चातुर्मास हेतु विराजमान थे!
उनके प्रमुख शिष्यो , प्रशिष्यो में तपस्वी बसन्ती लाल जी म.सा ( दुगड़ परिवार मन्दसौर के) , राजेन्द्र मुनि , प्रवर्तक रमेश मुनि , सलाहकार सुरेश मुनि, तपस्वी श्री अभय मुनि जी, . नरेन्द्र मुनि , प्रवर्तक विजय मुनि, उपाध्याय गौतम मुनि , तपस्वी श्री रतन मुनि राष्ट्रसंत कमल मुनि कमलेश, उप प्रवर्तिक चन्द्रेश मुनि , सिद्धार्थ मुनि आदि है!
एसे वात्सल्य मूर्ति , मेवाड़ भूषण, धर्म सुधाकर कइ संस्थाओं के प्रणेता पूज्य श्री प्रतापमल जी म.सा. जिनके दर्शन का कइ बार सोभाग्य प्राप्त हुआ निम्बाहेडा संघ पर भी उनकी बहुत कृपा रही ! के पावन जन्म जयन्ती दिवस पर अनेकानेक वंदन आप जंहा भी विराजमान हे आपका आशीर्वाद बना रहे।
विजय कुमार लोढ़ा निम्बाहेड़ा ( पूणे)
उपाध्यक्ष: अ. भा. श्वे. स्था. जैन कांफ्रेस नइ दिल्ली ज्ञान प्रकाश योजना!
स्थाइ न्यासी : अ. भा. श्री जैन दिवाकर संगठन समिती( रजि.) मुख्य कार्यालय चतुर्थ जैन वृद्धाश्रम दुर्ग चितोड़गढ( राज.)
मंत्री: श्री जैन दिवाकर साहित्य प्रकाशन समिती चितोड़गढ़ ( राज.)
