संयम और दीक्षा ही चारित्र का दूसरा नाम है- आचार्य श्री विजय कुलबोधि सूरीश्वरजी म.सा.

रतलाम, 27 अक्टूबर। ज्ञान उसी का सफल है जिसके मन में चारित्र धर्म की स्थापना हो गई है। ज्ञान प्राप्ती के बाद भी जिसके दिल में चारित्र की भावना न होती हो तो वह अज्ञानी ही होता है। चारित्र का दूसरा नाम संयम और दीक्षा ही है। यह बात आचार्य श्री विजय कुलबोधि सूरीश्वरजी म.सा. ने शुक्रवार को सैलाना वालों की हवेली मोहन टाकीज में आयोजित विशेष प्रवचनमाला में कही।
आचार्य श्री ने दीक्षा के प्रकारों का वर्णन किया। उन्होने प्रेम दीक्षा को परिभाषित करते हुए कहा कि यदि आपने दीक्षा ली तो उसका मतलब जगत के सभी जीवों पर प्रेम बरसाना है, यहीं असली साधु जीवन है। हम किसी भी शुभ कार्य या आयोजन में लाखों रुपए खर्च करते है, अपनों को बुलाते है लेकिन कभी किसी जरूरतमंद को नहीं बुलाते है। हमारे मन में यह भावना होना चाहिए कि जिसे जरूरत है, हम उसका भी भला कर सके। यदि प्रभु को देखकर भी दीक्षा का भाव मन में आ जाए तो वह प्रभु दीक्षा कहलाती है। इसमें दूसरे की आराधना को देखकर भी आनंद आता है और मन में भावना उत्पन्न होती है। यदि दीक्षा की भावना भी मन में आ जाए तो अच्छा होता है। प्रभु की सभी चीजों से प्रेम करना चाहिए।
आचार्य श्री ने पश्चाताप दीक्षा का वर्णन करते हुए कहा कि यदि आप किसी की आलोचना करते हो तो उसका भी पश्चाताप करना चाहिए। यदि हमें अपनी गलती के बाद पश्चाताप न हो तो वह अपराध कहलाता है। कोशिश यह होना चाहिए कि किसी की आलोचना न करे। यदि हमे प्रेम नहीं है, पश्चाताप नहीं है, प्रमोद नहीं है तो इन दीक्षा का जीवन में कोई महत्व नहीं होता है। श्री देवसूर तपागच्छ चारथुई जैन श्रीसंघ गुजराती उपाश्रय, श्री ऋषभदेवजी केशरीमलजी जैन श्वेताम्बर तीर्थ पेढ़ी द्वारा आयोजित प्रवचन में बड़ी संख्या में श्रावक-श्राविकाएं उपस्थित रहे।

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