श्रद्धा देती है ज्ञान को गरिमा और साधना को महिमा
रतलाम,17 नवंबर। जीवन में श्रद्धा का बहुत महत्व है। श्रद्धा से ज्ञान को गरिमा और साधना को महिमा प्राप्त होती है। बिना श्रद्धा के कभी ज्ञान को गरिमा और साधना को महिमा नहीं मिलती, इसलिए श्रद्धावान बनो। वर्तमान समय में श्रद्धा का संकट बहुत गहराता जा रहा है। यदि जीवन में आनंद चाहिए, तो संतों की वाणी और प्रभु के वचनों में श्रद्धा रखो।
यह बात परम पूज्य, प्रज्ञा निधि, युगपुरूष, आचार्य प्रवर 1008 श्री विजयराजजी मसा ने कही। छोटू भाई की बगीची में प्रवचन के दौरान उन्होंने कहा कि हमारी श्रद्धा जितनी मजबूत होगी, उतना ही ज्ञान और साधना आनंद देने वाले बनेंगे। आध्यात्म जगत में श्रद्धा का संकट बहुत बडा संकट होता जा रहा है। इससे बचने के लिए हर व्यक्ति को सत्संग में बैठकर अपनी श्रद्धा का अवलोकन करना चाहिए। श्रद्धा कभी खण्डित नहीं होना चाहिए। श्रद्धा जब अखण्ड और अटूट रहती है, तभी ज्ञान को गरिमा और साधना को महिमा देने वाली बनती है।
आचार्यश्री ने कहा कि श्रद्धा पतिव्रता नारी के समान होती है, जो सपने में भी पर पुरूष की कामना नहीं करती। वर्तमान समय में गुरू, और प्रभु के प्रति ऐसी ही श्रद्धा रखने की आवश्यकता है। यदि जीवन में श्रद्धा नहीं हो, तो कितनी ही तपस्या कर लो, उसका लाभ नहीं मिलता। मोक्ष के मार्ग पर वे ही आगे बढते है, जिनकी श्रद्धा मजबूत होती है। श्रद्धा परम दुर्लभ होती है, देव, गुरू और धर्म के प्रति इसका अटूट और अखण्ड होना मनुष्य को गौरान्वित करता है।
आचार्यश्री ने कहा कि सूर्याेदय होने पर जैसे अंधकार मिट जाता है, वैसे ही श्रद्धा का उदय होने पर ज्ञान का प्रकाश फैलकर जीवन के अंधकार को खत्म करता है। श्रद्धा में कभी किसी को पीछे नहीं रहना चाहिए। आरंभ में उपाध्याय प्रवर श्री जितेशमुनिजी मसा ने आचारंग सूत्र के माध्यम से विभिन्न लोको की विवेचना की। इस दौरान देश के विभिन्न स्थानों से आए गुरूभक्तों के साथ बडी संख्या में स्थानीय श्रावक-श्राविकागण उपस्थित रहे।