कार्तिक सुदी १३ शनिवार को जैन दिवाकर जन्म जंयती व दीक्षा जंयती देशभर में गुरु भक्तो ने गुणानुवाद कर मनाई

रतलाम । आज कार्तिक सुदी 13 शनिवार को महान मानवतावादी युग पुरुष संत जैन दिवाकर श्री चौथमल जी महाराज की 146 वीं जन्म जयंती एवं उपाध्याय ज्योतिषाचार्य कस्तुरचंदजी म.सा. की दीक्षा जयंती एवं तपस्वीराज, संघ सेवा भावी,श्रमण संघीय महामंत्री पूज्य श्री मोहन मुनि जी म. सा. की 100 वी जन्म जयंती दिवस देशभर में गुरु भक्तो ने गुणानुवाद एवं धार्मिक आयोजन कर मनाई ।

महान मानवतावादी युग पुरुष संत जैन दिवाकर श्री चौथमल जी महाराज

प्रस्तुति : विजय कुमार लोढ़ा निम्बाहेड़ा( पूणे)
भारतीय संस्कृति की धारा में श्रमण संस्कृति का विशिष्ट स्थान हे! इसी श्रमण परम्परा में एक आदर्श विशिष्ट युग पुरुष सन्त का अभ्युदय हुआ! उनका नाम है श्री चौथमल जी महाराज!
जिनका जन्म संवत 1934 की कार्तिक शुक्ला त्रयोदशी को नीमच (म. प्र) में माता केशर की कुक्षी से हुआ ! पिता का नाम श्री गंगारामजी चौरड़िया !18 वर्ष की योवनावस्था में संसार की असारता एवम जीवन के साश्वत सत्य का आकलन करने वाले आप वो चिराग थे, जिन्होने अपने ज्ञान पुंज का प्रकाश विकीर्ण कर जगत् के अज्ञान अंधकार को दुर करने तथा विषमताओं को हर्षोल्लास में बदलने का दृढ़ संकल्प लिया था! अत: विवाह होने के बाद भी वेराग्य का एसा रंग चढ़ा कि संवत 1952 की फाल्गुन शुक्ला तीज रविवार को ग्राम बोलीया ( म. प्र) मे आपने गुरुवर सरल स्वभावी श्री हिरालाल जी म.सा. से दीक्षा ग्रहण की! ज्ञान का गहन अध्ययन करके वो एक ऐसे सन्त हुए कि उनके विशिष्ट सदगुणो ओर तपोमय जीवन से प्रभावित होकर समाज ने उन्हें , जैन दिवाकर , प्रसिद्धवक्ता , महामनीषी , जगतवल्लभ , भारत भूषण , लोक नायक , संघ एक्यता के अग्रदुत , आदि उपाधियो से उन्हें अलंकृत किया! वास्तव में इन उपाधियो से वे अलंकृत नही हुए वरन वह उपाधिये ही धन्य हो गइ!
सद्गुण प्रचार की नई शैली
श्री जैन दिवाकर जी महाराज ने जनता में सदाचार एवम अंहिसा के प्रचार के लिए नइ शैली अपनाइ ! तत्कालीन धर्म प्रचारको की खण्डन मण्डन प्रधान शैली से हटकर उन्होने जनता को सरल और जन भाषा में प्रेरणा दी ! उनकी सत्यपुत वाणी ने जन जन के ह्रदय को स्पर्श किया ! उनके शब्दो में आडम्बर नही , ह्रदय का घोष था! परिणाम स्वरूप श्रोताओं की हार्दिक कोमल भावनाए सहस जंकृत हो जाती और वह स्वयम ही हिंसा आदि दुर्गुणो से विरक्त हो कर उनका त्याग कर देते!
वाणी का अदभूत प्रभाव
मानव ह्रदय पर जितना प्रभाव वाणी का पड़ता है उतना किसी दुसरी वस्तु का नही , जैन दिवाकर जी महाराज वाणी का मोल खुब जानते थे इसलिए उनकी वाणी इतनी प्रभावशालीनी थी! उनके शब्दो को राजा और रंक, जैन व जैनेतर , हिन्दु हो या मुसलमान , भारतीय हो या योरोपीय सभी पर अचूक प्रभाव पड़ता ! सभी गदगद होजाते थे! उन्हें लगता था कि जैसे उनका हृदय ही बोल रहा हो ! इसही लिए वो प्रसिद्ध वक्ता व वाग्मी कहलाए! उनकी वाणी सुनने जो एक बार आता वह हमेशा के लिए उनका भक्त बनजाता ! उनकी वाणी में एसा आकर्षण था कि राह चलते रुक जाते व एकाग्र मन से सुनने लगते! एक अंग्रेज कर्नल दस मिनिट का संकल्प लेकर आया पर पचास मिनीट तक भाव विभोर होकर सुनता रहा ! चोरो ने सुना तो चोर्य कर्म छोड़ दिया , शराबीयो ने शराब छोड़ दी, शिकारीयो ने तीर कमान खूंटी पर टांग दिये , धर्म के नाम पर होने वाला मुक पशुओ का वध बंद हो गया , मांसाहारीयो ने मांस भक्षण त्याग दिया यह सब जैन दिवाकर जी महाराज की वाणी का प्रभाव था!
सरल ह्रदयी सच्चे सन्त
जैन दिवाकरजी महाराज सच्चे सन्त थे! भारतीय संस्कृति में सन्त के लिए सरल ह्रदय और मधुर स्वभाव आवश्यक माना गया है! उसे निष्कपट होना चाहिये! साधना से प्राप्त शक्तियो द्वारा चमत्कार प्रदर्शन में नंही पड़ना चाहिये! उनका ह्रदय सरल था उनका उद्देश्य किसी को प्रभावित करना नही था वरना सब को सुख साता देना था! यह बात दुसरी कि उनकी सहज साधना के प्रभाव से भक्तो की आधी – व्याधि और उपाधी स्वयम ही दुर हो जाती! जैसे सरोवर के निकट जाते ही स्वतः ही ग्रीष्म की दाहकता कम हो जाती और शीतलता व्याप्त हो जाती हैं ! वे निर्दोष श्रमण चर्या का पालन करते हुए अंहिसा की ज्योति जगाते रहे!
उनकी स्तुति में उनके सुशिष्य उपाध्याय श्री केवल मुनि जी म.सा ने ए्क गीतिका में लिखा हे
घर घर में धर्म फैलाया हे
अंहिसा प्रेम सिखाया हे
खट खट चलती , रोकी तेज कटारी
में बार बार बलिहारी
हो जिन शासन के ताज
गुरु महाराज बडे उपकारी , में बार बार बलिहारी
एसे महान सन्त जिनके गुण कुछ पंक्तियो में पूर्ण नही हो सकते , वो लाखो भक्तो के श्रद्धा के केन्द्र हे एसे गुरुदेव के पावन जन्म जयन्ती पर कोटि कोटि वंदन
विजय कुमार लोढ़ा निम्बाहेड़ा ( पूणे)

करुणा के कल्प वृक्ष स्वरूप हुए है मालव रत्न , उपाध्याय , ज्योतिष्याचार्य श्री कस्तुर चंद जी म.सा

पावन दीक्षा दिवस पर विशेष
आप श्री का जन्म मालवा भूमि के जावरा शहर में विक्रम संवत 1948 में धर्मशीला माता फूली की कुक्षी से हुआ पिताश्री थे श्री रतिचन्द जी चपलोत ! आपकी दीक्षा संवत 1962 की कार्तिक शुक्ला त्रयोदशी को रामपुरा में गुरुदेव , परम धेर्यवान , आचार्य श्री खूब चंद जी म.सा के पावन सानिध्य में हुई ! आपको ज्ञान दाता रहे दादा गुरुदेव वादीमान मर्दक श्री नंद लाल जी म.सा एवम अखण्ड यशधारी आचार्य पूज्य श्री मन्ना लाल जी म.सा!
सेंकड़ो श्रमण श्रमणीयो की सेवा का लाभ आपने लिया एवम हजारो श्रमण श्रमणियो , श्रावक श्राविकाओं को आपने ज्ञान दान दिया! हजारो अभाव ग्रस्त भाइ – बहनों के दुख दर्द को सुना, गुरु भक्तो से उन्हे तृप्त भी किया है! इस दृष्टी से आप श्री इस शताब्दी के करुणा के कल्प वृक्ष रहे हे!
अगणित गुण पुष्पो से सुवासित परम आदरणीय जीवन जीने वाले महापुरुष की , विनयशीलता , आगम अध्ययन- रसिकता, अनुशासन तथा सेवानिष्ठा , आचार – विचार, मधुर व्यहवार , से आपके दादा गुरुदेव पूज्य श्री नंद लाल जी म.सा, पूज्य गुरुदेव श्री खूब चंद जी म.सा, जैन दिवाकर पूज्य गुरुदेव श्री चौथमल जी म.सा , उपाध्याय श्री प्यार चंद जी म.सा. आदि सन्त सती प्रसन्न ही नही बहुत प्रभावित थे!
आपकी प्रतिभा ज्ञान- संयम- तप गरिमा बढती ही रही ! संवत 2002 में आपको गणीपद, पर प्रतिष्ठित किया , फिर संवत 2016 में सम्प्रदाय के प्रवर्तक बने और संवत2033 में आचार्य सम्राट श्री आनंदरीषी जी म.सा ने आपको श्रमण संघ का उपाध्याय पद प्रदान किया! आपका मष्तिषक ज्ञान का भंडार तो हृदय करुणा का सागर , आपने अनगिनत अभावग्रस्त साधार्मिक बन्धुओ का दुख दर्द मिटाया !
लगभग 94 वर्ष की उम्र पूर्ण कर 80 वर्ष की दीक्षा पूर्ण कर संवत 2042 की आसोज शुक्ला नवमी दिनांक 22 अक्टुम्बर 85 को उनका देवलोक गमन रतलाम शहर में हुआ! ऐसे महान ज्योतिर्धर , उपाध्याय , पूज्य गुरुदेव श्री कस्तुर चंद जी म.सा के दीक्षा दिवस पर हृदय की अनन्त आस्था के साथ वंदन , आपकी कृपा सदा बनी रहे

तपस्वीराज, संघ सेवा भावी,श्रमण संघीय महामंत्री पूज्य श्री मोहन मुनि जी महाराज साहब की 100 वी जन्म जयंती दिवस पर आपका जीवन परिचय

आपका जन्म शाहपुरा जिला भीलवाड़ा राजस्थान में माता श्रीमती गुलाब बाई पारख की कुक्षी से एवं श्रीमान सेठ मांगीलाल जी साहब पारख के घर आंगन में अगहन कृष्ण पंचमी विक्रम संवत 1980 मंगलवार (ईस्वी सन 16 दिसंबर 1924 )को हुआ। 20 वर्ष की युवावस्था में आषाढ़ शुक्ल सप्तमी विक्रम संवत 2000( ई. सन 27 जून 1944) रविवार को अपने पूज्य श्री हजारीमल जी महाराज साहब की निश्राय में महामंदिर जोधपुर में संयम धारण कर लिया।
यदि हम मुनि श्री के नाम व दीक्षा तिथि के विषय में चिंतन मनन तथा विश्लेषण करें तो जहां तक नाम का संबंध है व्याकरण की दृष्टि से मोहन शब्द मोह + न = मोहन। जिसमें मोह नहीं अर्थात संत। दीक्षा संवत 2000 यह संख्या पूर्णता को दर्शाती है शुक्ल पक्ष का संबंध उज्जवलता – निर्मलता से है। रविवार का संबंध रवि (सूर्य ) से है। रवि तप तेज सेवा सहिष्णुता का प्रतीक है। इसी कारण मुनि श्री सेवा ,समर्पण, संतत्व तप तेज सेवा तपस्या तथा सहिष्णुता के प्रतिरूप हैं। जैन दिवाकर गुरुदेव श्री चौथमल जी महाराज साहब से प्रभावित हो आप उनकी सेवा में आ गए। गुरु शिष्य का रिश्ता राम और हनुमान की जोड़ी से पहचाने जाने लगा ।यह हनुमान दिवाकर जी के कार्यों को/ सपनों को निरंतर आगे बढ़ने का प्रण लिए जिनशासन को आगे बढ़ा रहा था। जो भी कार्य को करने का बीड़ा अपने हाथों में लिया ,उसे पूरा करके ही दम लिया। चाहे जो कठिनाई, मुश्किलें हो, मोहन का हाथ जहां लगा समझो पूरा होना ही है। उनकी वाणी में दम और चेहरे पर ओजस्विता स्वत: दिखती थी। इंदौर का इमली बाजार स्थित विशाल और भव्य नवीन महावीर भवन। मोहन मुनि जी काले डंडे वाले के नाम से बच्चा बच्चा होने पहचानता है। (यह गुरुदेव जैन दिवाकर जी का ही डंडा था) जो उन्हें गुरु भक्ति में गुरुदेव से मिला और उन्हें जान से भी ज्यादा प्यार था ,क्योंकि उसके साथ उनके गुरुदेव की यादें जुड़ी हुई थी। आज जो भी जैन दिवाकर भक्त है उन्हें जोड़े रखने में उनका महत्वपूर्ण योगदान रहा है, ऐसा कहें तो अतिशयोक्ति नहीं होगी।
आप श्री की प्रेरणा से कई संस्थाएं प्रारंभ हुई जो कि जैन दिवाकर जी के नाम से ही है
श्री जैन दिवाकर स्मारक सागोद रोड, रतलाम
श्री जैन दिवाकर हॉस्पिटल एंड रिसर्च सेंटर सागोद रोड, रतलाम श्री जैन दिवाकर हॉस्पिटल कोटा
श्री जैन दिवाकर चिकित्सालय नीमच
जैन दिवाकर सामायिक साधना भवन रतलाम कोठी इंदौर
जैन दिवाकर सामायिक साधना भवन महावीर नगर इंदौर
इंदौर और रतलाम में भोजन शाला, विद्यालय, रतलाम में वृद्धाश्रम,बोलिया में हॉस्पिटल नामली में स्थानक आदि।
आपश्री ने वर्षों तक एकांतर तप किये । बेले बेले पारणे किए, कितने ही समय तक अन्न का त्याग किया। श्री मोहन मुनि जी को श्रमण संघ के प्रथम आचार्य श्री आत्माराम जी महाराज साहब ने तपस्वीराज, द्वितीय आचार्य श्री आनंद ऋषि जी महाराज साहब ने संघ सेवाभावी, तृतीय आचार्य श्री देवेंद्र मुनि जी महाराज साहब ने वरिष्ठ सलाहकार एवं श्रमण संघ के चतुर्थ पट्टधर आचार्य श्री शिव मुनि जी महाराज साहब ने संघ के महामंत्री पद पर मनोनीत किया। इस प्रकार मुनि श्री को श्रमण संघ के चारों आचार्य का आशीर्वाद प्राप्त हुआ था। जैन दिवाकर जी के एकता के सूत्र को आपने अपने दिल में बसाया रखा था। मोहन मुनि जी महाराज साहब इसी पावन उद्देश्य को लेकर आचार्य श्री शिव मुनि जी महाराज साहब से श्रमण संघ में कैसे एकता बनी रहे विचार विमर्श करने के लिए धुन का पक्का धुनी हनुमान रतलाम से दिल्ली की ओर निकल पड़ा। ऐसी लगन, ऐसा विश्वास बिरले ही मिलते हैं ।जयपुर तक पहुंच भी चुके थे ।अब दिल्ली दूर नहीं थी। मन में एकता के भाव और ज्यादा मजबूत हुए और 26.05. 2007 अचानक दूदू के पास 85 वर्ष की उम्र में सड़क दुर्घटना में आपके प्राण पखेरू फुर्र हो गए ।और एक ओजस्वी तपस्वी संत (64 वर्षीय संयमी जीवन) हमारे बीच नहीं रहे ।शायद नियति को उनकी इस लोक से भी ज्यादा जरूरत रही होगी। आज हमारे बीच आप नहीं है, परंतु उनसे जुड़ा हर परिवार, उस परिवार का छोटे से छोटा बच्चा भी आपको याद करता है, स्मरण करता है। आप सभी को इतना स्नेह प्यार से अभिसिंचित कर देते थे कि परिवार दौड़ता हुआ आपके दर्शन करने आता था। आपकी स्मरण शक्ति इतनी तेज थी कि सभी को नाम से संबोधित कर हर एक का दिल जीत लेते थे। बच्चों से वृद्ध तक के चहेते श्रमण संघिय महामंत्री घोर तपस्वी पूज्य श्री मोहन मुनि जी महाराज साहब को उनके 100 वे जन्म जयंती दिवस पर सादर नमन वंदन अभिनंदन। आपकी कृपा और आशीर्वाद संघ, समाज और परिवार पर सदैव बना रहे।