युवा ही स्वस्थ समाज और उन्नत राष्ट्र के निर्माण का मेरूदंड -आचार्य श्री विजयराज जी म.सा.

रतलाम,09 दिसंबर | समाज में तीन वर्ग है – अमीर, गरीब और न अमीर, न गरीब, मध्यम वर्ग। अमीर वर्ग को सामाजिक परिवर्तन की जरूरत महसूस नहीं होती और गरीब वर्ग को अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति से ही फुर्सत नहीं मिलती। मध्यम वर्ग क्या करे, वह कुछ नहीं कर सकता, इसलिए सामाजिक जीवन में कोई परिवर्तन नहीं आ पा रहा है। समाज किं कर्त्तव्य विमुढ़ है। वह दुर्दशा का शिकार हो रहा है।
यह बात शांत क्रांति संघ के आचार्य श्री विजयराज जी म.सा. ने युवा वर्ग से कही | धर्म चर्चा में उन्होंने कहा कि किं कर्त्तव्य विमुढ़ता आज की बात नहीं। हर युग में हर समाज अपने आपको असहाय स्थिति में खड़ा पाता है।सामाजिक क्रांति तभी आ सकती है जब युवा वर्ग सजग और कर्मठ बने। युवा ही स्वस्थ समाज और उन्नत राष्ट्र के निर्माण का मेरूदण्ड होता है। युवा जितना नैतिक और चरित्रनिष्ठ होगा समाज भी उतना ही उन्नत और समृद्ध होगा।
आचार्य श्री ने कहा कि व्यक्ति और समाज एक दूसरे के पूरक होते है। व्यक्ति के बिना समाज का कोई अस्तित्व नहीं बनता और समाज के बिना व्यक्ति का कोई मूल्य नहीं होता। व्यक्ति अपने त्याग, तपश्चर्या और साधना से स्वयं समष्टि बन जाता है। प्रारंभ में व्यक्ति के सामने कठिनाईयां आती है मगर वह अगर जीवट व्यक्तित्व का धनी होता है तो कठिनाईयां दूर होती जाती है। विरोध करने वाले ही अनुरोध करने लग जाते है।
आचार्य श्री ने कहा – आज का युग धर्म और सम्प्रदाय के नाम पर भी गुमराह हो रहा है वह इनमें पृथककरण नहीं कर पा रहा है। सम्प्रदाय एक व्यवस्था है। इसमें परिवर्तन होता आया है। धर्म तो हमारी आस्था है। वह एक और अखंड होती है। सम्प्रदाय छिलके समान है जबकि धर्म फल के समान। धर्म विभाजित नहीं होता, वह एक ही होता है।
आचार्य श्री ने कहा कि मानवता की दुहाई देना और मानवता का आचरण करना, दोनों में फर्क है। मानवता के आचार से जुड़ा हर धर्म महान होता है और हर धर्म गुरू पूजनीय। जब युवा वर्ग मानवता के धर्म से जुड़ जायेगा तब न केवल उसके जीवन में बल्कि वह जिस समाज में जीता है वह उन्नत, समृद्ध और पवित्र बन जायेगा। युवा वर्ग जितना उपदेशों से जीवट नहीं बनता उतना प्रयोगों से बनता है। हर युवा को प्रयोगधर्मी होना चाहिए। प्रयोग ही उसके व्यक्तित्व का निर्माण करते है और वे ही समाज और राष्ट्र में क्रांति ला सकते है।