जैन दिवाकारीय श्रमण संघीय मालव सिंहनी तीर्थ स्वरूपा गुरुणी मैया पूज्य श्री कमलावती जी मसा के शताब्दी समारोह अवसर पर विशेष

तीर्थंकर भगवंतों के समय काल में “साध्वी प्रमुखा” की व्यवस्थाओं से संबंधित जानकारी सभी से साझा कर रहे हैं

साभार : चौंसठ सती सज्झाय
प्रस्तुति : सुरेन्द्र मारू, इंदौर

साध्वी प्रमुखा के अधिकार और कर्तव्य

गतांक से आगे….
साध्वी -प्रमुखा का विशाल साध्वी समुदाय एक साथ नहीं रहता था। उन्हें अलग-अलग संघाटकों में विचरण करने की आज्ञा साध्वी प्रमुखा देती थीं। संघाटक कितनी साध्वियों का हो ? संघाटक का नेतृत्व कौन करें ? संघाटक किस क्षेत्र में विचरण करें ?आदि सारी बातों का निर्णय साध्वी -प्रमुखा करती थीं।
उन्हें ध्यान रखना होता था कि संघाटक का नेतृत्व जिनको दिया जा रहा है, उनमें उन्हीं की भांति कमो-बेश गुण विद्यमान है या नहीं, साथ के संघाटक के ज्ञान – दर्शन- चारित्र की व उनके आहार – विहार -औषध भेषज की देख – रेख करने में वे कुशल व सामर्थ्यवान है या नहीं।
प्रथम तीर्थंकर आदिनाथ प्रभु की प्रमुख -साध्वी मुख्य -शिष्या ब्राह्मी व सुंदरी अपने भ्राता बाहुबलि को उपदेश देने, सचेत करने, प्रभु का संदेश देने कि “अहंकार के हाथी से उतरों” – गहन वन में गई थी ।
तिन्नाणम् – तारयाणम् की अधिकारिणी बन पाई।
जैन मत अर्थात जैन सिद्धांतो, जिनेश्वर के उपदेशों को जिन्होंने प्रकाशित, प्रसारित, प्रचारित किया। विश्व में सिद्धांतो की दृष्टि से केवल जैनमत ही एक ऐसा मत है जो पूर्णत: प्राकृतिक, वैज्ञानिक एवम विश्वसनीय है। इसे जानने व मानने के लिए चाहिए विवेक – बुद्धि और सम्यग्दृष्टि। जिनका सम्यग्ज्ञान उज्जवल था,सम्यग्दर्शन प्रदीप्त था और सम्यक् चारित्र निर्मल था – तीर्थंकर भगवंत ने उन्हें ही अपने विभिन्न तीर्थ – समुदाय का प्रमुख पद दिया। उन्होंने उग्र तप करके, विशुद्ध संयम पालन करके, एक आदर्श अनुकरणीय जीवन व्यतीत करके, जन -जन के सम्मुख अपने संपूर्ण जीवन को, जीवन के एक – एक व्यवहार को जैन – मत बनाया, जीवन के एक -एक क्षण को जैन -मत- मय जीया। तभी उनको बड़ी सिखणी अर्थात साध्वी प्रमुखा का उत्तरदायित्व दिया गया।
आज भी होता है साध्वी – प्रमुखा का पद। वैसे आज यह पंचम आरे का समय है अतः भिन्न मत, भिन्न संप्रदाय तो है, पर उनके प्रमुख यदि जिन सिद्धांतों के प्रति दृढ़ आस्था- वान हो तो निश्चय ही जैन -मत को जिन- वचनों को जन-जन में सशक्त भागीदारी प्राप्त हो सकती है।
महापुरुषों के प्रसंग प्रकाश स्तंभ तुल्य :
जैन धर्म के महत्व को जीवन – मूल्यों के साथ जोड़ा जाए तो यह जीवन स्वर्ग से भी उत्तम, सुखी, शांत, मर्यादित, क्लेश रहित ईर्ष्या व स्पर्धा रहित बन सकता है। महापुरुषों ने, महान संतों ने, महान सतियों ने जिसे उज्जवलता प्रदान की, आप भी यदि पूर्ण आस्था के साथ उसे अपने जीवन से जोड़ेंगे तो अंधकारमय पथ में भटकते मानव वर्ग के लिए आपका जीवन प्रकाश – स्तंभ बन सकेगा।