- दीक्षा दिवस पर विशेष
- प्रस्तुति : विजय कुमार लोढ़ा निम्बाहेड़ा (पूणे)


संवत 1997 का चातुर्मास , जगत वल्लभ जैन दिवाकर गुरुदेव श्री चौथमल जी म.सा का चातुर्मास जोधपुर था ! उस समय पाली जैन गुरुकुल में रहने वाले पांच विद्यार्थी गुरुदेव के दर्शन करने पहुंचे , सहज ही उन्होंने पूंछा कि तुम्हारे मे से दीक्षा कौन लेगा , उसमें एक छात्र मूलचंद ने हाथ खड़ा किया कि में लूगां और गुरुदेव के पास वैरागी बन गये ! इनके पहले कन्हेया लाल जी महाराज पाली में विराजमान थे तब उनके प्रवचन सुनने जाते ओर वंहा पर जेन दिवाकर जी द्वारा रचित जम्बु कुमार चरित्र सुना तथा उनके हृदय में वेराग्य भावना जागृत हुई!
भागवती दीक्षा
संवत 1997 की फागुण कृष्णा पंचमी को समदड़ी में आपकी दीक्षा हुई व दिवाकर जी महाराज ने उन्हे श्री वृद्धि चंद जी महाराज का शिष्य घोषित किया ! दस वर्ष लगातार गुरुदेव के साथ रह कर , आगम अध्ययन किया !
बहुत ही मधुर भाषा में प्रवचन
बहुत ही सीधी सादी भाषा में प्रवचन देना व जो भी आपके प्रवचन मे आता स्वतः ही उसके मन में उनके प्रवचन सुनने की उत्कंठा रहती उन्हे मधुर वक्ता की उपाधी प्रदान की गइ ! प्रवचन सभा आप जैन दिवाकर जी महाराज द्वारा लिखी चंदा प्रभु की आरती ,ऊं जय जिनवर चंदा से प्रारम्भ करते व जब आप प्रवचन प्रारम्भ करते
जय अचलासन शान्ती सिंहासन वाले दोहे से करते वह सुनते ही श्रोता एकाग्र चित्त हो जाते
आपकी प्रवचन शैली भी गुरु जैन दिवाकर जी की तरह थी , सर्व प्रथम भक्तामर की एक गाथा से प्रारंभ कर उसका विवेचन कर फिर अपना उदबोधन प्रारंभ करते ! उपाध्याय प्रवर गुरु जैन दिवाकर जी द्वारा रचित मुक्ति बोध के दोहे बहुत दी ओज पूर्ण शैली में कहते श्रोता भाव विभोर हो जाते !
समय के सजग प्रहरी *
उपाध्याय प्रवर समय के सजग प्रहरी थे , प्रवचन बिल्कूल सही समय पर प्रारंभ करना व सही समय पर समाप्त करते थे , उदयपुर संघ ने उन्हे सन 2004 के वर्षावास में समय के सजग प्रहरी की उपाधी श्री गुलाब चंद जी कटारिया की उपस्थिती में प्रदान की थी ! वह उस समय राजस्थान के गृह मंत्री थे!
मालव रत्न उपाध्याय श्री कस्तुर चंद जी महाराज की विशेष कृपा
मालव रत्न करुणा के सागर श्री कस्तुर चंद जी म.सा जो कि साधार्मिक सहायता के बहुत बड़े प्रेरणा स्त्रोत थे उनके पास 14 वर्ष रह कर आपने भी साधार्मिक सेवा को अपना मिशन बनाया व समाज के हजारो व्यक्तियों को लाभ पंहुचाया , पूज्य उपाध्याय श्री के इस कार्य में दुर दुर के लोग जुड़े हुए थे ! तथा कई परम्पराओं के श्रावक उसमें स्वयम आकर अपनी भागीदारी उसमें करते!
इन्द्र धनुषी व्यक्तित्व के धनी
उपाध्याय प्रवर अच्छे वक्ता तो थे ही साथ में उन्होने गध्य व पध्य में दो दर्जन से अधिक पुस्तके लिखी! इसमें विशेष रूप से उनके द्वारा लिखे चरित काव्य आज भी वर्षावास में कई साधु – साध्वियों द्वारा प्रवचन के दोरान प्रस्तुत किये जाते हे !
एसे अनेक गुणो के सागर पूज्य उपाध्याय , शताब्दी नायक , मालव भूषण श्री मूल मूनि जी म.सा. की पावन दीक्षा जयन्ती पर कोटिशः वंदन
विजय कुमार लोढ़ा निम्बाहेड़ा( पूणे)
