समाज के लिए जिये

लेखक – नितिन राठौड़
भारतीय जनता पार्टी
रतलाम मध्य प्रदेश

समाज सबके जीवन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, व्यक्ति समाज के बिना जी नहीं सकता है। व्यक्ति का जीवन समाज के ऊपर निर्भर है। हमारे समाज मे कई तरह के स्वभाव के लोग रहते है, जो समाज के कई अंगो को हमारे सामने रखते है। हमारे समाज मे क्रोधी, लालची, ईमानदार, भ्रष्टाचारी, पशु प्रेमी, मानवतावादी और शिष्टाचारी ऐसे कई प्रकार के लोग रहते है, जो समाज के ऊपर अपने कर्मो से प्रभाव डालते है।
समाज के कर्मठ, बुरे लोगों ने समाज मे जो इंसानियत है उसको हमेशा जड़ से खत्म करने का काम किया है, लोगों को अपने स्वार्थ के लिए उपयोग किया है।
जो लोग समाज को बेहतर बनाना चाहते है उन्हे सबसे पहले अपने जीवन मे अच्छे विचारों की सहायता से बदलना होगा। बुरे, लालची, भ्रष्टाचारी और पापी कामों से दूर रहना होगा। समाज के लिए जिये, समाज के लिए लड़े, हाथ से हाथ मिलाकर अपने जीवन की उन्नति करे।
“समाज के बदलने से पहले खुद को बदलना ज़रूरी है, दुनिया को बदलने से पहले खुद को ठीक करना ज़रूरी है। यह बिलकुल ऐसा ही है कि हमें जब ट्रैफिक पुलिस वाला पकड़ता है और चालान करने करने लगता है तो हम सौ रुपए देकर अपनी जान छुड़ाते हैं। ऐसे में हम क्या करते हैं? चूंकि चालान पांच सौ रुपए का होता, इसलिए हमने चार सौ रुपए बचा लिए। ज़ाहिर है हम उस ट्रैफिक वाले से चार गुणा ज्यादा बड़े चोर हैं। ऐसे में हम किस समाज के बदलाव के बात करते हैं।”
समाज में तीन प्रकार के व्यक्ति होते है । एक तो सर्व सामान्य जिन्हें रोटी कमाने और पेट भर लेने के अतिरिक्त दीन दुनिया की खबर नहीं रहती। संसार में रोटी ही उनका एकमात्र उद्देश्य होता है। समाज किधर जा रहा है उसमें किन-किन सुधारों की आवश्यकता है इस चिन्ता से उनका कोई सरोकार नहीं होता। आराम से भोजन वस्त्र मिल गया प्रसन्न हो गए, उसमें घाटा आ गया दुःखी हो गये। बस यही उनका जीवन और यही उनका ध्येय होता है। ऐसे आदमियों को जड़ एवं अभावुक कहा जा सकता है। अन्य पशु-पक्षियों और उनके जीवन में कोई विशेष अन्तर नहीं होता। संसार में ऐसे लोगों की ही बहुतायत हुआ करती है। इनमें भोजन एवं प्रजनन क्रिया की प्राकृतिक प्रेरणा के अतिरिक्त कोई विशेष चेतना नहीं होती। बहुत अधिक हुआ तो अपने बाल-बच्चों की खोज-खबर की चिन्ता करली। समाज क्या है, राष्ट्र क्या होता है, सभ्यता एवं संस्कृति किसे कहते हैं, संसार में इन सबका क्या मूल्य-महत्व है, ऐसे अच्चाशयता पूर्ण विचारों से वे न तो जरा भी परिचित होते और न उनकी चिन्ता कर पाते हैं।
इतना ही नहीं समाज में फैलने वाली विकृतियां इसी जड़ वर्ग में जन्म लेती और पनपती हैं। यही वह जन साधारण है जो अपनी जड़ता के कारण रोग, शोक, गरीबी-बेकारी, शोषण एवं सन्तापों से ग्रस्त रहता है और जिसके दुःख से अन्य चेतनावान व्यक्तियों को दुखी एवं चिन्तित होना पड़ता है। समाज कि विशेषता है कि वह सबको अपने मे समाहित कर लेता हैं बिना किसी भेदभाव के।
साधु से लेकर डाकू तक सब समाज का अभिन्न अंग हैं। हाँ यदि हम समाज मे सुखी और खुश रहना चाहते है तो कुछ करना पडेगा।
मेरे विचार से आपके जैसी मुस्कान स्वयं को और अन्य समाजजनों को खुश रखने मे समर्थ है। दुसरा प्रत्येक समाज के कुछ घोषित एवं अघोषित नियम होते है , वर्जनाएँ होती हैं उनका पालन करना अतिआवश्यक है क्योंकि उनका निर्माण आवश्यकता और अनुभव के आधार पर हुआ करता है जो सभी के सर्वांगीण विकास के लिए बहुत ही आवश्यक होता हैं।