रविवार सुबह 6 बजे निकलेगा सेमलियाजी तीर्थ का दो दिवसीय पदयात्रा संघ



रतलाम। हम कैसे बने भगवान विषय पर हनुमान रूण्डी में चल रहे विशेष प्रवचन के तीसरे दिन आचार्य श्री विजय कुलबोधि सूरीश्वरजी म.सा. ने भगवान शब्द को पूर्ण रूप से परिभाषित करते हुए बताया कि “भ” से दूसरों का भला करना, “ग” से कभी किसी पर गरम नहीं होना और क्रोध नहीं करना, “वा” का अर्थ वात्सल्य यानी दूसरों को प्रेम देना और “न” यानी नम्र बनने से है। यदि मानव भव में हम इन चार भूमिकाओं को पूर्ण कर लेते है तो हम भगवान बन सकते है।
आचार्यश्री ने कहा कि चाकू, छूरा, तलवार, बंदूक, तोप और परमाणु बम से अधिक ताकत प्रेम में है। हमने पैसा कमाना तो बहुत सीख लिया है लेकिन प्रेम करना नहीं सीख पाए है। आज कई घरों में पति-पत्नी के बीच में आपस का प्रेम कम हो गया है। तलवार भी दो प्रकार – लोहे और प्रेम की होती है। भले ही हमें प्रेम मिले या न मिले लेकिन हमें दूसरों को प्रेम देते रहना है।
आचार्यश्री ने कहा कि जीवन में जब कभी संघर्ष का समय आता है तब कोई साथ खड़ा नहीं होता है। ठीक ऐसे ही जब आप सफलता पाते हो तो आपको किसी को बुलाने की जरूरत नहीं होती है, लोग स्वयं आपके करीब आने लगते है। सफलता में आपकी पहचान होती है लेकिन निष्फलता में आपको दुनिया की पहचान होती है। जीवन में यदि जो नमेगा वह सबको जमेगा।
रविवार को निकलेगा दो दिवसीय पदयात्रा संघ
आचार्यश्री की निश्रा में 17 मार्च, रविवार को सुबह 6 बजे रतलाम से सेमलियाजी तीर्थ का दो दिवसीय पदयात्रा संघ निकलेगा। इसका आरंभ मोहनबाई सौभागमलजी तलेरा परिवार के यहां से होगा। यहां से सभी एक साथ पैदल रवाना होंगे। यात्रा के ग्राम पलसोड़ा पहुंचने पर दोपहर में यहां प्रवचन होंगे।