जावरा (अभय सुराणा) । धर्म स्वयं को जानने पहचानने की कला है स्वयं को परखने की कसौटी है अस्तित्व बोध श्री का नाम ही धर्म है धर्म जीने की कला का प्रशिक्षण देता है और बुराई को त्याग कर खुद की बुराई देखना शाश्वत धर्म है। जो खुद को तरासता है वह साधु वती अंगिकार करने का सामर्थ रखता है। वर्तमान में व्यक्ति शरीर को सजाने संवारने में लगा रहता है जिससे आत्मा तप्त नहीं होगी आत्मा की शांति के लिए आत्मज्ञान अति आवश्यक है उक्त उदगार आध्यात्मिक योगी जिन शासन गौरव श्री उमेश मुनि महाराज “अणु”की पुण्य स्मृति दिवस पर श्री शंखेश्वर पारसनाथ मंदिर पोषध शाला पर पूज्य तपस्वी संत श्री अभय जी महाराज ने व्यक्त किये आपने कहा जैन दर्शन भय मुक्त करने का दर्शन है बैर पाप अभिमान को त्याग कर सम्यक भाव दृष्टि रखना ही जैन दर्शन की सार्थकता है ।महापुरुषों के गुणो को आत्मसात करते हुए जीवन यापन करते हुए धर्म आराधना जब तक त्याग साधना करते हुए अपने मानव जीवन को सफल बनाना है धर्म सभा को पवन मुनि महाराज साहब ने भी संबोधित करते हुए कहा हमारे पथ अलग हो सकते हैं किंतु सबका मार्ग एक है वह है मोक्ष मार्ग ।हर व्यक्ति को मोक्ष की चाह है किंतु मोक्ष पाने के लिए स्वयं की आत्मा का पुरुषार्थ करते हुए धर्म साधना आराधना करने की महत्व आवश्यकता होगी तब जाकर हम मोक्ष मार्ग को प्रशस्थित कर सके।
गुणानुवाद सभा को कमल नाहटा चंद्र प्रकाश ओस्तवाल अभय सुराणा आनंद रांका ललित भंडारी शैतानमल दुग्गड निधि कोठारी अशोक झामर ने भी संबोधित किया धर्म सभा का संचालन सुभाष टुकडीया ने किया इस अवसर पर बड़ी संख्या में श्रावक श्राविका उपस्थित थे।
इन्होंने करी प्रभावना
झम्मू बाई रतनलाल जी मेहता सूरज भाई आनंद कुमार की प्रक्रिया श्रीमती कमलाबाई फतेहलाल जी मेहता विजय कुमार जी प्रदीप कुमार जी लुक्कड़, शैतानमलजी निलेश कुमारजी दुग्गड, शांतिलाल जी अनिल जी चतरर कांतिलालजी सचिन खारीवाल विजय कुमार वीरेंद्र कुमार पावेचा ।