



रतलाम 12 अगस्त । सौ.वृ.त. श्री राजेंद्र सूरि त्रिस्तुतिक जैन श्वेतांबर श्री संघ एवं चातुर्मास समिति द्वारा नीम वाला उपाश्रय खेरादी वास में रतलाम नंदन प. पू .श्री 1008 जैन मंदिर के प्रेरणादाता, राष्ट्र संत कोकण केसरी गच्छाधिपति आचार्य देवेश श्रीमद् विजय लेखेन्द्र सुरिश्वर जी म.सा. की आज्ञानुवर्ती एवं मालवमणि पूज्य साध्वी जी श्री स्वयं प्रभाश्री जी म.सा. की सुशिष्य रतलाम कुल दीपिका शासन ज्योति साध्वी जी श्री अनंत गुणा श्रीजी म.सा,श्री अक्षयगुणा श्रीजी म.सा. श्री समकित गुणा श्री जी म.सा. श्री भावित गुणा श्री जी म.सा. उपासना में विराजे हैं जिनका चातुर्मास में नित्य प्रवचन चल रहे हैं ।
इसी तारतम्य में आज सोमवार को साध्वी श्री नवकार मंत्र की साधना प्रारंभ की गई तथा विधि विधान से पूजन एवं जाप किए जा रहे हैं बीच-बीच में ज्ञानवर्धक प्रश्नोत्तरी भी की गई। अभी तक के जो मंगल प्रवचन दिए गए उससे संबंधित प्रश्न पूछे गए तथा उत्तर भी बताए गए इसी तारतम में साध्वी श्री अनंत गुणा श्री मसा. ने प्रश्न किया की मोहन तीर्थ को मोहन तीर्थ क्यों कहते हैं। इसी में बताया कि आप लोग प्रवचन तो सुनते हो परंतु उसको हृदय में नहीं उतरते हो। मैंने कुछ दिन पहले पूरी स्टोरी सुनाई थी। मोहन ब्राह्मण परिवार से थे। वह न सुन सकते थे ना देख सकते थे ना हाथ पैर हिला सकते थे सिर्फ मांस के पिंड थे उनके पिता गुरुदेव के पास आए और गुरुदेव की नजर मोहन पर पड़ी गुरुदेव ने कहा कि मैं इसको ठीक कर दूंगा तो क्या तुम मुझे दे दोगे। उनके माता-पिता ने कहा कि आप जी यह न सुन सकता है ना हाथ पर चला सकता है यह सिर्फ मांस का पिंड है और देने के लिए हां कर दी गुरुदेव ने अपने मत्रों से वाक्षेप डाला और वह जो निर्जीव जैसा था उसमें जीव आ गया आगे जाकर गुरुदेव ने सोचा की सभी शिष्य अपने आप में उच्च स्तर के हैं परंतु मोहन मेरा सीधा-साधा है इसके लिए मुझे ही कुछ करना पड़ेगा। उस समय साधक और यति मंत्र के महारथी होते थे बैठे-बैठे ही दूर दराज के काम कुछ ही क्षणों में कर देते थे। दूसरों के द्वारा जो अनरगल क्रियाएं की जाती थी तो गुरुदेव अपनी शक्ति सिर्फ शिष्यों के हित में और जैन धर्म के उत्थान के लिए ही प्रयोग करते थे आगे जाकर एक खेड़ा नाम का गांव मे जमीन ली और वहां पर गुरुदेव ने उसे खेड़े को नाम दिया मोहन और मोहन खेड़ा जो तीर्थ के नाम से प्रसिद्ध है। दूसरा प्रश्न मसा ने पूछा कि गुरुदेव मोहन का समाधि स्थल कौन सा है इसमें कोई जवाब नहीं दे पाया तो उन्होंने बोला कि अगले हफ्ते बताना अगले हफ्ते तक का समय है आपके पास। इस तरह से कई प्रश्न उत्तर किए गए तथा नवकार मंत्र की साधना प्रारंभ की गई। सौ. वृ.त. त्रीस्तुतिक जैन श्री संघ एवं राज अनंत चातुर्मास समिति, रतलाम के तत्वाधान में बड़ी संख्या में श्रावक श्राविकाए व साधक गण उपस्थित थे।