

रतलाम । ज्ञानशाला ज्ञानवान, बनाने की शाला है । इसमें प्रवेश होने वाला बच्चा नर्म, शीलन और लज्जावान बनता है । ज्ञानशाला बच्चों में संस्कारों के बीजों का रोपन बड़े ही अच्छे ढंग से करती है । इसमें न केवल लेसन याद करवाए जाते है बल्कि प्रैक्टिकल प्रयोगों के द्वारा उनके भाव तंत्र को भी पॉजिटिव एनर्जी के साथ एक्टिव किया जाता है ।
उक्त बात श्री तेरापंथ सभा भवन में चल रहे चातुर्मास के अंतर्गत महा तपस्वी आचार्य श्री महाश्रमण जी की सुशिष्या साध्वी श्री पुण्यप्रभा जी ने ज्ञानशाला दिवस पर आयोजित ज्ञानशाला में उपस्थित बच्चों और धर्मानुरागी महानुभावनों को सम्बोधित करते हुए व्यक्ति किए।
साध्वी श्री ने आगे कहा कि चार्तुमास में करणीय कार्यक्रम ज्ञानशाला का महत्वपूर्ण उपक्रम है। यह आचार्य श्री तुलसी के दिव्य स्वप्नो में से एक स्वप्न है। जिसे सब एकजुट होकर साकार करें तथा हमारी भावी पीढ़ी को सुदृढ़ बनाएं । आज के ये नौनिहाल देश के भावी कर्णधार है । हमारी भावी पीढ़ी संस्कारी बनेगी तो वह दिन दूर नहीं है जब भारत पुन: आध्यात्मिक गुरु का दर्जा प्राप्त कर विश्व क्षितिज पर आदर्श बनकर उभरेगा । साध्वी श्री ने बच्चों में पाए जाने वाले स्वाभाविक गुण दोषों का विश्लेषण कर गुणों को पल्लवित पुष्पित करने की प्रेरणा दी ।
संघ अध्यक्ष विजय वोरा, सचिव मनीष बरवेटा ने बताया कि चार्तुमास के अन्तर्गत चल रहे धार्मिक कार्यक्रमों में आज तेरापंथ सभा भवन में ज्ञानशाला का आयोजन किया गया । जिसमें प्रात: बच्चों द्वारा प्रभात फेरी निकाली गई । कार्यक्रम का आरम्भ बच्चों द्वारा ”अर्हं-अर्हं की वंदना फलेेÓÓ इस प्रार्थना के साथ हुआ । ज्ञानशाला की शिक्षिकाओं एवं बच्चों द्वारा प्रेरणास्पद प्रस्तुतियां दी गई । शासन माता साध्वी प्रमुखा श्री कनक प्रभा जी द्वारा रचित ज्ञानशाला गीत साध्वी वृंद द्वारा प्रस्तुत किया गया।
ज्ञानशाला प्रशिक्षिका ने अभिभावकों को आव्हान करते हुए एक भावपूर्ण गीत का गायन किया । संस्कार निर्माण में परिवारों वालों की क्या भूमिका होती इस पर ज्ञानशाला परिवार ने परिसंवाद के माध्यम से बहुत सुंदर प्रस्तुति दी । इसके पश्चात बच्चों को पुरस्कृत कर सम्मानित किया गया । कार्यक्रम में बड़ी संख्या में समाजजन उपस्थित थे । ज्ञानशाला का संचालन श्रीमती मधु मांडोत ने कुशलता पूर्वक किया।