ऐसे कार्य करने से हर समय बचे जो जीवन में पाप को बढ़ाए-दर्शनप्रभाजी म.सा.

  • जिनवाणी श्रवण करने से खुलती आत्मकल्याण की राह-चेतनाश्रीजी म.सा.
  • गोड़ादरा स्थित महावीर भवन में महासाध्वी इन्दुप्रभाजी म.सा. के सानिध्य में चातुर्मासिक प्रवचन

सूरत, 28 अगस्त। भगवान महावीर की वाणी सुनने से प्राणी मात्र का उद्धार हो जाता है। भगवान की वाणी श्रवण करने से पापी का पाप तिर जाता है। प्रवचनों में जिनवाणी के रूप में हमे भगवान की वाणी ही श्रवण करने का पावन सुनहरा अवसर प्राप्त हो रहा है। जो भव्यात्मा इसका लाभ ले रही है वह आत्मकल्याण के पथ पर अग्रसर होगी। ये विचार मरूधरा मणि महासाध्वी जैनमतिजी म.सा. की सुशिष्या सरलमना जिनशासन प्रभाविका वात्सल्यमूर्ति इन्दुप्रभाजी म.सा. ने बुधवार को श्री वर्धमान स्थानकवासी जैन श्रावक संघ गोड़ादरा के तत्वावधान में महावीर भवन में आयोजित चातुर्मासिक प्रवचन के दौरान व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि हमे स्वयं भी धर्म करने के साथ अन्य को भी धर्म से जुड़ने की प्रेरणा देनी चाहिए। सुदर्शन श्रावक ने अर्जुन माली को धर्म की प्रेरणा दी। उन्होंने छह माह में कर्म बांधे थे ओर छह माह में ही कर्म का बंधन तोड़ दिया। उन्होंने भजन जीवन को मैने सौंप दिया भगवान तुम्हारे हाथों में की प्रस्तुति भी दी। आगम मर्मज्ञा डॉ. चेतनाश्रीजी म.सा. ने कहा कि साधु साध्वी जिनवाणी श्रवण करा हमारे कल्याण की राह बताते है। हलुकर्मी जीव जिनके कर्म बहुत हल्के होते है वहीं साधु साध्वी के दर्शनों के लिए आते है। बाहर से जो दर्शनों के लिए आते है वह मेहमान नहीं स्वधर्मी भाई-बहन होते है। मांगलिक के चार शरणा होते है जिनको रोज प्रवचन के बाद श्रवण करना चाहिए। हलुकर्मी जीव जल्दी से चार शरण ग्रहण कर लेता है। दर्शन करते समय साधु साध्वी भगवंत की सुख साता भी पूछनी चाहिए। संतों के दर्शन सौभाग्य से मिलते इसलिए अवसर को कभी छोड़ना नहीं चाहिए। व्याख्यानी प्रबुद्ध चिन्तिका डॉ. दर्शनप्रभाजी म.सा. ने कहा कि हमे जीवन में पुण्यार्जन करते हुए पाप कर्म का क्षय करना है। ऐसे कोई कार्य नहीं करे जो जीवन में पाप को बढ़ाए। उन कार्यो को करने में आगे रहे जिनसे जीवन में पाप घटता हो। इस जन्म में कोई भी अच्छा कार्य या पुण्यार्जन करेंगे तो उसका फल हमे अवश्य प्राप्त होगा। आज हम जो सुख भोग रहे है वह भी किसी जन्म के पुण्यार्जन का ही फल है। तत्वचिंतिका आगमरसिका डॉ. समीक्षाप्रभाजी म.सा. ने कहा कि दुनिया में तीन चीजे है वहां, जहां ओर राह। हमे कोई भी कदम आगे बढ़ाते समय इस बारे में सोचना अवश्य चाहिए। हम जिस राह पर आगे बढ़ रहे है वहां क्या मिलेगा ओर क्या नहीं मिल सकता। जहां धर्म होता हो वहां जाना चाहिए ओर जहां अधर्म का वास हो वहां से दूर रहना चाहिए। उन्होंने कहा कि पाप की 82 प्रकृतियां बताई गई है। पाप वर्ण की तरह है 9 बार से बांधा जाता है। व्यक्ति का पुरूषार्थ ओर भाग्य दोनों साथ चलते है। पुरूषार्थ करने पर ही भाग्य फलता है केवल भाग्य भरोसे रहने से जीवन सफल नहीं हो सकता। धर्मसभा में सेवाभावी दीप्तिप्रभाजी म.सा. एवं विद्यालिभाषी हिरलप्रभाजी म.सा. का भी सानिध्य रहा। महासाध्वी मण्डल की प्रेरणा से प्रवचन में कई श्रावक-श्राविकाओं ने तेला,बेला, उपवास,आयम्बिल, एकासन आदि तप के भी प्रत्याख्यान लिए।
पर्युषण में प्रवचन के बाद ही खोले व्यापारिक प्रतिष्ठान
आठ दिवसीय पर्वाधिराज पर्युषण की आराधना एक सितम्बर से शुरू होगी। महासाध्वी इन्दुप्रभाजी म.सा. ने कहा कि पर्युषण हमारी आत्म आराधना का पर्व है जिसमें अधिकाधिक तप त्याग करना है। उन्होेने कहा कि हमे पाली, जोधपुर,डूंगला जैसे स्थानों से प्रेरणा लेनी चाहिए जो पर्युषण समय में प्रतिष्ठान बंद रख धर्म साधना करते है। हमें पर्युषण में जिनवाणी श्रवण करने के बाद ही कार्यस्थल या प्रतिष्ठान पर जाए। पर्युषण में प्रवचन के समय दुकाने बंद रखने को लेकर पूज्य जयमलजी म.सा., पूज्य रघुनाथजी म.सा. ने भी प्रेरणा प्रदान की थी ओर उनकी प्रेरणा का असर श्रावक-श्राविकाओं पर अब भी कायम है। पर्युषण में आठो दिन 24 घंटे का नवकार मंत्र जाप होगा। बाहर से पधारे सभी अतिथियों का स्वागत श्रीसंघ एवं स्वागताध्यक्ष शांतिलालजी नाहर परिवार द्वारा किया गया। संचालन श्रीसंघ के उपाध्यक्ष राकेश गन्ना ने किया। चातुर्मास में प्रतिदिन सुबह 8.45 से 10 बजे तक प्रवचन हो रहे है।

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