पात्रता जब तक नहीं बनती, तब तक धर्म की शुरुआत नहीं होती- साध्वी श्री शाश्वतप्रियाश्रीजी म.सा.

रतलाम 11 जुलाई । जिनशासन ने सबसे अधिक महत्व पात्रता को दिया है और प्रवचन पात्रता बनाते है । पात्रता जब तक नहीं बनती, तब तक धर्म की शुरुआत नहीं होती है। महत्व प्रवचनकार का या प्रवचन खंड का नहीं और ना ही वह जिस हॉल में चल रहा है उसका होता है। प्रवचन जिस हृदय में बैठता है, वह कैसा है, उसका महत्व है |
यह उद्गार साध्वी श्री शाश्वतप्रियाश्रीजी म.सा. ने नीमवाला उपाश्रय में आयोजित प्रवचन में व्यक्त किए । उन्होंने कहा कि
जैसे ऑपरेशन थिएटर में ऑपरेशन करने वाले डॉक्टर का हाथ नहीं पकड़ा जाता, वैसे ही जिसका ऑपरेशन हो रहा होता है उसके पैर को भी नहीं हिलाया जाता है। मतलब प्रवचन खंड में एंटर होने के बाद ना तो प्रवचन कार को डिस्टर्ब किया जाता है और न प्रवचन सुनने वाले को। एक बार चित्त विचलित हो जाता है, तो उसका परिणाम यह आता है कि प्रवचन कार की धारा टूट जाती है। चित्त विक्षिप्त हो गया और फोर्स टूट जाता है जिससे कि हजारों श्रोताओं को जो लाभ होने वाला था उससे वंचित रह जाते है और निमित्त बनते है लेट आने वाले, बीच प्रवचन में बंधन करने वाले, बीच प्रवचन में आगे आने वाले। यह सब दोष के भागी होते है।
उन्होंने कहा कि घर का आंगन ही घर के अंदर की लक्ष्मी के बारे में बताता है। आंगन के गेट पर पता चल जाता है कि घर कैसा होगा। चप्पल को देखकर पता चल जाता है कि अंदर क्या होता होगा है। चप्पल कहां उतरना है, यह भी जिनशासन सिखाता है। बिखरा हुआ चप्पल या सिस्टम से रखा हुआ चप्पल ही यह बताता है कि अंदर स्थिति अच्छी है या बिगड़ी हुई है। अंदर शिष्टता होती है तो बाहर शिष्टता नजर आती है। अंदर स्वच्छता होती है, तो बाहर स्वच्छता होती है। आंगन को स्वच्छ रखना, आंगन को पवित्र रखना ही जिनशासन की अभिषेक और पूजा है।