व्यक्ति गुणों से पूजनीय होता है, स्वयं को अच्छा दिखाने से उद्धार संभव नहीं है- श्री अतिशयमुनिजी म.सा.

मालव केसरी पूज्य श्री सौभाग्यमलजी म. सा . की 41 वीं पुण्यतिथि 19 जुलाई को

रतलाम। आचार्य श्री उमेशमुनिजी म.सा. के सुशिष्य धर्मदास गणनायक प्रवर्तक पूज्य श्री जिनेंद्रमुनिजी म.सा., मुनिमंडल एवं साध्वी मंडल के सानिध्य में वर्षावास स्थल डीपी परिसर लक्कड़पीठा पर प्रतिदिन धर्मसभा आयोजित हो रही है। वही 19 जुलाई को मालव केसरी, प्रसिद्ध वक्ता, महाराष्ट्र विभूषण पूज्य गुरुदेव श्री सौभाग्यमलजी म. सा. की 41 वीं पुण्यतिथि जप-तप, त्याग तपस्या के साथ उत्साहपूर्वक मनाई जाएगी। गुरुवार को आयोजित धर्मसभा में श्री अतिशयमुनिजी म.सा. ने फरमाया कि जिसे लोभ कषाय का उदय हो वह दूसरों को अपनी ओर आकर्षित करते हैं। भगवान ने किसी को अपनी ओर आकर्षित नहीं किया। आकर्षण दो प्रकार का होता हैं, शरीर का और गुणों का। भगवान फरमाते हैं कि जीव को जब तक शरीर का आकर्षण रहेगा, तब-तक उसका विकास नहीं होने वाला है। जीव में गुणों का आकर्षण होगा तो वह सबको अपनी और आकर्षित करेगा। जीव को गुण की समझ नहीं है , वह दुर्गुण को भी गुण मान लेता है। दुर्गुण के आकर्षण के कारण संसार और धर्म का वास्तविक स्वरूप समझ नहीं पाता है। नरक में जीव लगातार वेदना सहन करता है लेकिन यहां पर भी यदि अशुभ कर्म का उदय हो तो वेदना होती है। अगर श्रद्धा मजबूत है तो जीव का विकास संभव है, नहीं तो कुछ नहीं होगा। प्रायः जीव को लोभ कषाय अच्छा लगता है। आप चिंतन करना कि क्या कषाय की प्रवृत्ति आपकी श्रद्धा को कमजोर कर रही है। समझ पूर्वक किया गया कार्य सफल होता है। उद्देश्य पूर्वक की गई सीमित क्रिया भी अधिक लाभ देती है। व्यक्ति धन “स्टेटस मेंटेन” करने के लिए कमाता है। धन होता है तो वह उसका उपयोग ज्यादा दिखावे के लिए करता है।व्यक्ति गुणों से पूजनीय होता है। स्वयं को अच्छा दिखाने से स्वयं का उद्धार संभव नहीं है। रत्नपुरी गौरव श्री सुहासमुनिजी म.सा. ने फरमाया कि स्वयं की आत्मा की शुद्धि के लिए की गई सभी क्रिया मोक्ष मार्ग पर आगे ले जाती है। इसके अतिरिक्त और कोई कार्य इस और नहीं ले जाता है। जैसे-जैसे पाप बढ़ते हैं, वेदना बढ़ती जाती है। मनुष्य भव में बुढ़ापा आना निश्चित है। इसी प्रकार बचपन, यौवन हो या बुढ़ापा रोग कभी भी आ सकते हैं, इसलिए धर्म क्रिया कर लो। बाद में पछताना नहीं पड़ेगा कि,दुर्लभ अवसर होने के बाद भी धर्म नहीं किया। बाद में पश्चाताप करने से अच्छा है वर्तमान में पुरुषार्थ करना। शरीर गंदगी से भरा हुआ है, इसे धर्म क्रियाओं से साफ करना है। शरीर के माध्यम से तप, त्याग और तपस्या कर सकते हैं। तपस्या करके हम पुराने कर्मों का क्षय कर सकते हैं। सम्यक पुरुषार्थ करना है, इसके माध्यम से शरीर के प्रति राग घटता जाएंगा । शरीर का राग जितना घटता जाएंगा , उतना मोक्ष के नजदीक होगा। यहां प्रवर्तक श्री जिनेंद्रमुनिजी म.सा., मुनिमंडल एवं साध्वी मंडल के वर्षावास में तप आराधनाएं रंग ला रही है। तपस्वी अठ्ठाई, 9, 11, 13, 16 आदि की तपस्या कर रहे हैं। इसके अलावा ऐसे भी कई तपस्वी हैं, जिनकी गुप्त आराधना चल रही है। तपस्वी का आराधक तप की बोली लगाकर संघ की ओर से बहुमान कर रहे हैं। गुरुवार को धर्मसभा में संजेली, सैलाना, बदनावर, खाचरोद आदि कई स्थानों के श्रावक, श्राविकाएं बड़ी संख्या में उपस्थित थे। जप-तप से मनाई जाएगी मालव केसरी पूज्य श्री सौभाग्यमलजी म. सा . की 41 वीं पुण्यतिथि 19 जुलाई को आचार्य श्री उमेशमुनिजी म.सा. के सुशिष्य धर्मदास गणनायक प्रवर्तक पूज्य श्री जिनेंद्रमुनिजी म.सा. के सानिध्य में मालव केसरी, प्रसिद्ध वक्ता, महाराष्ट्र विभूषण पूज्य गुरुदेव श्री सौभाग्यमलजी म. सा. की 41 वीं पुण्यतिथि जप-तप, त्याग तपस्या के साथ उत्साहपूर्वक मनाई जाएगी। प्रवर्तक पूज्य श्री जिनेंद्रमुनिजी म.सा., मुनिमंडल एवं साध्वी मंडल के सानिध्य में 18 व 19 जुलाई को श्रावक- श्राविकाएं सामूहिक बेले (दो उपवास) तप की आराधना करेंगे।