

जावरा (निप्र) । पर्वाधीराज पर्युषण महापर्व के दूसरे दिन धर्म सभा को संबोधित करते हुए महासती सरिता श्री ने फरमाया कि सामायिक’ करने से पंचेन्द्रिय-विषय एवं अंतरंग कषाय का नाश होता है और पदार्थ के प्रति ममता छूट जाती है। छह काय के जीवों के प्रति समता प्रकट होती है।जिस स्थान में, चित्त में विक्षेप करने के कारण न हों, जहाँ अनेक लोगों के वाद- विवादिक का कोलाहल न हो, अधिक असंयमी जीवों का आवागमन न हो, एकान्त स्थान हो, चैत्यालय हो या धर्मात्मा पुरुषों का प्रोषधोपवास करने का स्थान हो, ऐसे एकान्त स्थान में प्रसन्नचित होकर, समस्त मन के विकल्पों को छोड़कर सामायिक करनी चाहिये।
सामायिक करने से १४ राजूलोक में होने वाली पाप क्रिया रुककर अतिशय पुण्य का बन्ध होता है। चक्रवर्ती के सिंहासन से भी ऊंची है सामायिक, पुनिया श्रावक जिन्होंने भगवान महावीर के शासन में उत्कृष्ट सामायिक करके मोक्ष के द्वार खोल लिए भावपूर्वक सामायिक करने से सुख और शान्ति की प्राप्ति होती है। भावपूर्वक सामायिक करने से सुख और शान्ति की प्राप्ति होती है। आत्मतत्व की प्राप्ति का मूल कारण ‘सामायिक’ ही है। आर्तध्यान, रौद्रध्यान रूप संसार प्रवृत्ति की निवृत्ति और धर्मध्यान रूप प्रवृत्ति में सर्व जीवों के प्रति वैर विरोध को त्यागकर संयम तप और त्याग भावना के भावरूप उदासीनता को प्राप्त कर – समताभाव की सिद्धि के लिए सामायिक करने में आवे तो वह वीतरागता की प्राप्ति का कारण है।सम्यकत्व, ज्ञान, संयम और तप इन चार प्रकार की अवस्था को ‘सामायिक’ कहते हैं।
महासती प्रियंका श्री जी ने भी अपने उद्बोधन द्वारा बताया कि मोक्ष के चार द्वार हैं दानशील तप भावना दान देने से व्यक्ति का जीवन उत्तम होता है किंतु शील (ब्रह्मचर्य) के श्रृंगार को देवता भी नमस्कार करते हैं शुद्ध भावना से ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए क्योंकि ब्रह्मचर्य करने वाले व्यक्ति वंदनीय पूजनीय हो जाता है जो व्यक्ति सदाचार का पालन करता है उसका जीवन दर्पण के समान हो जाता है ब्रह्मचर्य मेरुदंड के समान है जो व्यक्ति इसकी साधना करता है और विकारों से विजय प्राप्त कर लेता है वह शूरवीर बन जाता है ब्रह्मचर्य पालन करने वाले व्यक्ति के स्पर्श करने से हमारे शरीर के रोग दूर हो जाते हैं ब्रह्मचर्य मानव जीवन का आभूषण है अंगूठी में यदि हीरा लगा है तो वह अनमोल है ज्ञानी पुरुषों ने कहा है की जीवन में यदि धन चला गया तो कुछ नहीं गया स्वास्थ्य चला गया तो कुछ गया है लेकिन यदि चरित्र चला गया तो सब कुछ नष्ट हो गया।
उपरोक्त जानकारी देते हुए श्री संघ अध्यक्ष इंदरमल टुकड़ियां एवं वरिष्ठ उपाध्यक्ष ओमप्रकाश श्रीमाल ने बताया कि प्रवचन की प्रभावना का लाभ श्रीमती सूरजबाई जी संपतबाई जी सोहनदेवी जी सुरेंद्र जी मेहता परिवार द्वारा लिया गया।