रतलाम। आचार्यश्री उमेशमुनिजी म. सा. के सुशिष्य धर्मदास गणनायक प्रवर्तकश्री जिनेन्द्रमुनिजी म. सा. आदि ठाणा 9 व पुण्यपुंज साध्वी श्री पुण्यशीलाजी म. सा. आदि ठाणा 10 के सानिध्य में डी. पी. परिसर पर बड़ी संख्या में श्रावक, श्राविकाएं आत्मशुद्धि -पर्वाधिराज पर्युषण महापर्व जप – तप, त्याग तपस्या सहित विभिन्न आराधना के द्वारा सार्थक कर रहे है।
गुरु समर्पण वर्षावास समिति के मुख्य संयोजक शांतिलाल भंडारी व श्री धर्मदास जैन श्रीसंघ के अध्यक्ष रजनीकांत झामर ने बताया कि पर्युषण महापर्व के दूसरे दिन प्रवर्तकश्री जिनेन्द्रमुनिजी म. सा. ने विशाल धर्मसभा को संबोधित करते हुए फरमाया कि जो अपने कषाय को मंद करते हैं, वे सुख का अनुभव करते हैं। कषाय को मंद करने के लिए तथारूप भावों की आवश्यकता होती है। ऐसी समझ पैदा होती है कि यह मेरे आत्मा के गुणों को नष्ट करने वाले हैं। भगवान की वाणी से समझ में आता है कि यह कषाय मेरी आत्मा का नुकसान करने वाले हैं। जब जीव को समझता है तो वह समभाव रखता हैं। अर्थात मन मार लेता है। मेरी वजह से कषाय बढ़े ऐसा कार्य नहीं करता है। अपने गुणों की वृद्धि करना है तो क्रोध को कषायों को मंद करना चाहिए। कषायों को मंद करने का यही मौका है। अतिशयमुनिजी म. सा. ने फरमाया कि जीवन चलाने के लिए विवाह आवश्यक है क्या ? धन आवश्यक है क्या ? बिना विवाह और धन के जीवन नहीं चल सकता है क्या ? विवाह के बाद कई परेशानियाँ होती है। प्रायः करके जीव विवाह करने और धन कमाने में मूल्यवान मनुष्य भव का अत्यधिक समय व्यर्थ कर देता है। प्रश्न यह है कि यदि आपसे पूछे कि विवाह करना आवश्यक क्यों है ? चिंतन करना है कि विवाह करना उचित नहीं है। परिवार चलाने व धन कमाने में व्यक्ति पाप करता है। भोगों को भोगते हुए आप कितने तृप्त हुए और कितने नहीं ? भोग को भोगते हुए जीव का अंत हो जाता है लेकिन अतृप्ति का अंत नहीं होता। भोग अधिक भोगते है तो रोग भी अधिक होते है। इससे मन, चरित्र, आत्मा सब खराब हो जाते हैं। ऐसा पाप छोड़ने में जीवन की सार्थकता है। पाप को पाप रुप में देखोगे तब जाकर इसे छोड़ने की भावना होगी।
आजीवन कुशील सेवन नहीं करने के प्रत्याख्यान ग्रहण किए पूज्य श्री अतिशयमुनिजी म. सा. ने अब्रह्म सेवन के दुष्परिणाम पर जिनवाणी के माध्यम से हृदय स्पर्शी सटीक व्याख्यान फरमाए। जिससे प्रभावित होकर धर्मसभा में लगभग समस्त श्रावक- श्राविकाओं ने आजीवन कुशील सेवन नहीं करने के प्रत्याख्यान प्रवर्तक श्री जिनेंद्रमुनि म. सा. से ग्रहण किए। प्रवर्तक श्रीजी ने प्रमोद भाव व्यक्त करते हुए श्रावक-श्राविकाओं की खूब-खूब अनुमोदना की व सभी को धन्यवाद दिया और कहा कि ऐसा बहुत ही सुंदर अवसर पहली बार देखने को मिला कि सामूहिक रूप से ऐसे प्रत्याख्यान ग्रहण किए। गौरतलब है इससे निश्चित ही अन्य श्रीसंघों के श्रावक श्राविकाओं को भी प्रेरणा मिलेगी। पूज्य श्री जिनांशमुनिजी म. सा. ने फरमाया कि भगवान फरमाते हैं कि व्यक्ति स्वयं के कर्मों से दु:ख प्राप्त करता है। माता-पिता, पत्नी, पुत्र-पुत्री जो भी संबंध जीव बनाता है, वह काम नहीं आता। फिर हम यह संबंध बना क्यों रहे है ? 9 माह जब हम माता के गर्भ में रहते हैं, तब वे खूब तकलीफ सहन करती है। हम बाहर आने के बाद उनके साथ क्या करते हैं। जिनवाणी हम सुनते हैं, उसमें भगवान कहते हैं कि जो भी रिश्ते है, वह दुख देने वाले हैं। बच्चों को हम बचपन से मोबाइल दे रहे हैं, खाना खिलाना हो तो मोबाइल दे दो, ये हम क्या कर रहे हैं ? हमारा कर्तव्य क्या है ? मोबाइल में बच्चा क्या देखता है। उसमें जो देखता है, वह सिखता है। हमें उन्हें मोबाइल नहीं, संस्कार देना है। एक भी रिश्ता आपको सुख देने वाला नहीं है, फिर भी हम उस सुख के पीछे भाग रहे हैं। धर्मसभा में साध्वी श्री अनंतगुणाजी म. सा. ने स्तवन प्रस्तुत किया। अंतगढ़ सूत्र का वाचन रत्नपुरी गौरव श्री सुहासमुनिजी म. सा. ने किया।
संचालन अणु मित्र मंडल के मार्गदर्शक राजेश कोठारी ने किया। प्रभावना का लाभ श्री धर्मदास जैन श्रीसंघ ने लिया। यहां पर बड़ी संख्या में आराधक तपस्या कर रहे है। शनिवार को मनाया जाएगा पक्खी पर्व प्रवर्तक श्री जिनेंद्रमुनिजी म. सा., मुनि व साध्वी मंडल के सानिध्य में शनिवार को पक्खी पर्व जप – तप – त्याग – तपस्या के साथ मनाया जाएगा। श्रावक श्राविकाएं सामूहिक उपवास आदि विविध आराधना करेगें। शाम को पक्खी पर्व का सामूहिक प्रतिक्रमण होगा।