गज सुकुमाल को संयम आराधना करते हुए कई कष्ट सहने पड़े – डॉ संयमलता म. सा.

रतलाम 22 अगस्त। ‘‘दान की मिसाल देवकी रानी ममता की मिसाल मां’’एवं साधना की सरगम गज सुकुमाल विषय पर प्रवचन में कहा कि जीवन में जो जैसा करता वह वैसा भरता है उक्त विचार पर्वाधिराज पर्युषण महापर्व के अवसर पर सैलाना वालों की हवेली मे आयोजित धर्मसभा मे जैन दिवाकरीय महासाध्वी डॉ संयमलता म.सा. ने व्यक्त किए ।

महासाध्वी जी ने देवकी रानी के पुत्र गज सुकुमाल के जीवन प्रसंग की चर्चा करते हुए कहा कि ऐसी महान आत्मा सदा प्रेरणा देने वाली है जिसने मात्र 18 वर्ष की आयु में सुबह राज लिया,दोपहर में दीक्षा ली ओर उत्कृष्ट साधना करते हुए शाम को सिद्ध बुद्ध मुक्त हो जाते है। जिसके मन में संयम लेने के भाव आते है वह भाग्यशाली होते है। अतंगडदशा सूत्र के मूल पाठ का वाचन एवं विवेचन करते हुए तीसरे अध्याय में शामिल गज सुकुमाल की कथा सुनाते हुए कहा कि संयम बहुत कठिन होता है लेकिन जब इसकी भावना बन जाए तो फिर रोका नहीं जा सकता है। गज सुकुमाल को संयम आराधना करते हुए कई कष्ट सहने पड़ते है पर वह समभाव से सब कुछ सहन कर लेते है। मां दो ही मौके पर रोती है जब बेटी घर छोड़ती है या बेटा मां को छोड़ देता है। माता-पिता सारे दुःख झेलकर भी संतान को सुख देने का प्रयास करते है ओर कंकर से शंकर बना देते है। वह संतान दुर्भाग्यशाली होती है जो अपने माता-पिता को वृद्धाश्रम में छोड़ते है। मां क्या होती यह उससे पूछे जिससे मां की ममता नहीं मिली। धर्मसभा के पश्चात दोपहर मे गज सुकुमाल पर धार्मिक प्रतियोगिता का आयोजन किया गया ।

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