

रतलाम 25 अगस्त । श्रुति संवर्धन वर्षा योग 2025 श्री चंद्रप्रभ दिगंबर जैन मंदिर स्टेशन रोड, रतलाम आचार्य 108 विशुद्ध सागर जी म. सा. के शिष्य मुनि श्री 108 सद्भाव सागर जी म.सा. एवं क्षुल्लक 105 श्री परम योग सागर जी म.सा. द्वारा चंद्रप्रभा मंदिर मे पाट पर विराजित है।
क्षुल्लक 105 श्री परम योग सागर जी म.सा. द्वारा उद्बोधन में कहा कि-भारतीय लोकमानस में रावण केवल एक राक्षस या खलनायक का नाम नहीं है। वह एक ऐसा चरित्र है, जिसमें विद्या, भक्ति, पराक्रम और राजनीति का अद्भुत संगम मिलता है, किंतु साथ ही अहंकार जैसी कमजोरियाँ भी उसकी पहचान बन जाती हैं। यदि हम जैन रामायण—विशेषतः आचार्य विमलसूरि के पउमचरिय—की दृष्टि से देखें तो रावण का स्वरूप और भी गहन व शिक्षाप्रद प्रतीत होताहै।
विद्या अध्ययन और ज्ञान-पिपासा
रावण का जन्म रत्नश्रवा और राक्षसी कुल की कैकसी के गर्भ से हुआ। वंश की द्वैतता ने ही उसमें असाधारण तेज और महत्वाकांक्षा दोनों का संचार किया।
बाल्यकाल से ही उसमें अद्भुत प्रतिभा थी। उसने गुरुकुल में जाकर वेद, गणित, राजनीति, खगोलशास्त्र, संगीत, औषधि-शास्त्र और तांत्रिक विद्या का गहन अध्ययन किया।
कहा जाता है कि वह वीणा-वादन में निष्णात था और उसने अनेक शास्त्रीय रागों की रचना की।
जैन परंपरा में उसे एक महान विद्वान और पंडित माना गया है। उसने लंका में पुस्तकालय और शिक्षा-केंद्र स्थापित किए। किंतु यही विद्या, जब संयम और मर्यादा से जुड़ी न रही, तो उसका उपयोग अत्याचार और छल के लिए होने लगा।
विवाह और पारिवारिक जीवन
विद्या अध्ययन के पश्चात रावण का विवाह मंदोदरी से हुआ। मंदोदरी मयदानव की पुत्री थीं—अत्यंत विदुषी, पतिव्रता और धर्मनिष्ठा की प्रतिमूर्ति।
उनसे रावण को कई संतानें हुईं, जिनमें मेघनाद (इंद्रजीत), अतिकाय, अक्षयकुमार और त्रिशिरा प्रमुख थे।
मंदोदरी बार-बार रावण को नीति और मर्यादा का पालन करने की सलाह देती थीं। जैन रामायण में उनका चरित्र आदर्श स्त्री के रूप में उभरा है। किंतु पति के अहंकार और वासना ने उनके धर्मनिष्ठ प्रयासों को निष्फल कर दिया।
रावण का व्यक्तित्व और विरोधाभास
जैन दृष्टि से रावण कोई सामान्य दैत्य नहीं, बल्कि “त्रैसठ शलाकापुरुषों” में से एक प्रतिनायक (विरोधी नायक) है।उसने लंका को स्वर्णपुरी बनाया, उत्तम प्रशासन दिया, जनता को संपन्न किया और विद्या-विज्ञान का केंद्र बनाया।वह भक्त था, विद्वान था, पराक्रमी था।लेकिन इसी रावण के भीतर अत्यधिक अहंकार और कामना ने उसे पतन की ओर ढकेला।सीता-हरण जैसे अनुचित कर्म ने उसके सारे गुण ढँक दिए और अंततः उनका जीवन पराजय व विनाश की कथा बन गया।
प्रवचनात्मक संदेश
जैन रामायण के अनुसार रावण का जीवन हमें यह सिखाता है कि—विद्या तभी सार्थक है जब वह संयम और धर्म से जुड़ी हो।भक्ति और पराक्रम भी तब श्रेष्ठ हैं जब उनमें विनम्रता हो।पत्नी या परिवार का धर्मोपदेश भी व्यर्थ हो जाता है, यदि पुरुष अहंकार और वासना में डूबा रहे।सच्चा नायक वही है, जो दूसरों की मर्यादा का सम्मान करे।
रावण का चरित्र इसलिए अनूठा है कि उसमें गहन विरोधाभास है—एक ओर महान विद्वान,भक्त और शासक; दूसरी ओर अहंकारी, और पराजित नायक।जैन परंपरा इसी विरोधाभास को उजागर कर हमें सावधान करती है कि ज्ञान, शक्ति और भक्ति का मूल्य तभी है जब वे संयम और धर्म से नियंत्रित हों। उक्त बात अपने प्रवचन में कहीं। उक्त जानकारी मंदिर समिति श्रावक संघ के संयोजक मांगीलाल जैन ने दी।