



रतलाम। 31 अगस्त 2025 रविवार कोश्रुति संवर्धन वर्षा योग 2025,श्री चंद्रप्रभ दिगंबर जैन मंदिर स्टेशन रोड, रतलाम आचार्य 108 विशुद्ध सागर जी म. सा. के शिष्य मुनि श्री 108 सद्भाव सागर जी म.सा. एवं क्षुल्लक 105 श्री परम योग सागर जी म.सा. द्वारा चंद्रप्रभा मंदिर मे पाट पर विराजित है।
लोकेंद्र भवन में चल रहे श्रावक संयम साधना संस्कार दश लक्षण महामंडल विधान में मुनि श्री 108 संभव सागर जी महाराज ने अपने उद्बोधन में कहा कि सरलता के माध्यम से ही कुटिलता और लोभ को जितना पड़ता है नहीं तो जीव की स्थिति गुड़ की मक्खी जैसी हो जाती है की मक्खी बैठ जाए बोर्ड पर तो कितना भी छूटने का प्रयास करें छूट नहीं पाती आखिरी में प्राण छुटने के साथ ही निकलती है। इसी तरह लोभी के प्राण और के चक्कर में निकलते हैं कि मुझे “और चाहिए” असंतुष्टि के भाव से ही लोभ का जन्म होता है। यह संतुष्टि के भाव से ही पवित्रता प्राप्त नहीं हो पाती इसलिए लोभ नहीं करना चाहिए। लोभ से जीव में चित्त में विकार और चिंता का जन्म होता है उसी से चारित्र का विकास नहीं बन पाता। लोग के कई प्रकार होते हैं रसेंद्रिय लोभ यह लोभ में जीव फंस जाए तो प्राण ही चले जाते हैं। इसके अंतर्गत स्वाद आता है जिस व्यक्ति स्वास्थ्य दवा देता है और जानने समझने के बाद भी स्वाद के वशीभूत होकर खाता है और प्राणों को छोड़ देता है। दूसरा स्पर्शेन्द्रिय एक जीव दूसरे जीव के वशीभूत होकर अपने प्राण गंवा देता है। यह संबंध हाथियों में देखा गया है कि अगर एक हथिनी को बांध दिया जाए और उसके आगे एक बड़ा सा गड्ढा करके ढंक दिया जाए तो हाथी हथिनी के लिए आता है और गड्ढे में गिरकर अपने प्राण गंवा देता है। जीव को इससे बचना चाहिए।
आपको देव, शास्त्र, गुरु का सहयोग मिला है इसलिए आप पुण्य आत्मा है और आपके पास में पांच इंद्रियां है परंतु इसका सदुपयोग करोगे तो भगवान बन सकते हो इन पाँचो इंद्रियों का सदुपयोग होना चाहिए। जैसे ग्राह इंद्रिय बुरी नहीं है आसक्ति बुरी है पतन का कारण है इसलिए इस इंद्रियों को तीर्थंकर में लगाओ भगवान में लगाओ। चौथी इंद्रिय चक्षु इंद्रिय है इसका उपयोग भगवान को देखने में किया जाए, आहार शोध में किया जाए, गिरते को उठाने में किया जाए तो आंखें खुली रखना और मन में गलत विचार आए गलत धारणाएं उत्पन्न हो तो आंखें बंद कर लेना चाहिए। इसी तरह कर्णेन्द्रिय है इसका उपयोग जिनेंद्र भगवान की पूजन सुनने में उपयोग हो तो जीवन धन्य होता है इन्हीं के माध्यम से आप वृत्ति बनेंगे, महावर्ती बनेंगे और आगे जाकर भगवान भी बन सकते हैं।
आज का आपका संकल्प यह होना चाहिए कि हर व्यक्ति में आपको भगवान देखना है चाहे वह शत्रु हो,मित्र हो या अन्य कोई भी हो। उक्त विचार प्रवचन श्रृंखला में कहे।
इस शिविर के निर्देश प्रतिष्ठा आचार्य श्री संतोष भैया जी ललितपुर है तथा संगीतकार हार्दिक जैन मुंबई द्वारा भजन किए जा रहे हैं। आयोजक श्री चंद्र प्रभ दिगंबर जैन श्रावक संघ, श्री विद्या सिंधु महिला मंडल श्री विमल सन्मति युवा मंच एवं निवेदक सकल दिगंबर जैन समाज रतलाम है। उक्त जानकारी श्रावक संघ संयोजक श्री मांगीलाल जैन ने दी।