मालव रत्न, उपाध्याय श्री कस्तुरचंदजी महाराज साहब की 40 वीं पुण्यतिथि पर संक्षिप्त जीवन परिचय

अभय सुराणा (पत्रकार) जावरा मो. 9827328328

श्रमण संस्कृति के एक ऐसे श्रमण जिनसे मानव जगत को सदा मार्गदर्शन मिला एवं जिन्होंने संसार को प्रकाश, उल्लास और विश्वास का आलंबन दिया है। मझला कद, गौर वर्ण, भरा पूरा बदन, उन्नत ललाट, चमकते चेहरे पर बिखरती खिलती सी रहने वाली मुस्कान, मुख से निस्वत सी निकलने वाली अमृत वाणी, सतत, शांति बरसाने वाले युगल नेत्र ऐसे अनूठे अनुपम व्यक्तित्तव जिन्हें हम स्थविरपद विभूषित, मालवरत्न, ज्योतिषाचार्य, करुणा सागर, उपाध्याय प्रवर श्री कस्तुरचंदजी म. सा. के नाम से पहचानते है, रामनवमी पर आपकी 40 वीं पुण्यतिथि पर उनके जीवन वृत्त से जुड़े कुछ दष्ट्रांत –

आप का जन्म मालवा भूमि के जावरा शहर में वि. सं. 1948 की जेष्ठ कृष्णा त्रयोदशी को पिताश्री श्री रतिचंदजी चपलोत के अंगना एवं माताश्री श्रीमती फूली देवी की कुक्षि से हुआ। वि. सं. 1956 के दुष्काल एवं वि. सं 1960 के प्लेग के दुष्काल में आपने अपने परिवार के आठ परिजनों को खो दिया। सोचिए उस बालक की क्या मनः स्थिति रही होगी, कैसे स्वयं को सम्हाला होगा।वि. सं. 1962 में पंडित प्रवर पूज्य श्री खूबचंदजी म. सा. चातुर्मास जावरा में हुआ। लेकिन गुरुदेव के प्रवचन का सानिध्य नियमित लेते हुए, गुरुदेव ने “नत्थि काइस अणागमो अर्थात प्रतिपल काल का आक्रमण चालु है। यह उपदेश आपके जीवन में वैराग्य के अंकुरण कर गया और गुरुदेव से कहा कि आपके उपदेश श्रवण कर में दीक्षा लेना चाहता हूँ।

संवत 1962 की कार्तिक शुक्ला तेरस, को रामपुरा में गुरु श्री जवाहरलालजी म. सा. के सानिध्य में पूज्य श्री खूबचंदजी म.सा. की निश्राय में आम के पेड़ के नीचे लालबाग, रामपुरा जिला नीमच में हजारों धर्म प्रेमी जनता के बीच दीक्षा अंगीकार की।दीक्षा के पश्चात आपने जैन शास्त्रों एवं आगम का गहन अध्ययन कर तप, साधना, संयम, विवेक, ज्ञान एवं चारित्र की कठोर तपस्या की। अपनी दीर्घ दीक्षावधि में आपने उत्तरांचल में जम्मू – कश्मीर से लेकर सुदूर दक्षिण भारत तक पैदल धर्मानुकूल विहार कर कोटि-कोटि जैन व अजैन जनता को अपनी सुमधुर वाणी की ज्ञान गंगा प्रवाहित कर परोपकार एवं अहिंसा का अमर पाठ पढ़ाया। वि.सं. 1975 का वर्षावास करने कोटा पधार रहे थे, रास्ते में साथी मुनि भेरुलालजी को अत्यंत तेज बुखार हो गया, गाँव में कोई जैन घर नहीं, एक टुटे-फूटे से स्थान पर रात्रि विश्राम हेतु रुके, रात्रि को तेज आँधी तुफान और तेज वर्षा के कारण छत से भी पानी आने लगा। रुग्ण साथी को बचाने के लिए आप और मुनि कजोड़ीमलजी रात भर चादर ताने खड़े रहे। ज्वर न उतरने पर आप तीनों मुनियों के उपकरणों को लेकर 19 मील चलकर कोटा पहुँचे। वहाँ उपकरण रख पुनः अपने साथियों के पास गये और उन्हें लेकर कोटा वापस आये।उज्जैन से जावरा की और विहार के रास्ते में ज्वर से पीड़ित एक पटेल ने आपसे विनती की कि मुझे कोई मंत्र सुनाओ मैं ज्वर से पीड़ित हूँ। तब आपने जैन दिवाकर चौथमल जी रचित ‘साता की जो जी श्री शांतिनाथ प्रभु शिवसुख दीजो जी स्तवन एवं मांगलिक श्रवण करवाया, और कुछ ही देर में ज्वर उतर गया। कुछ ही देर में पुरे गाँव में खबर फेल गई और गुरुदेव के पास मेला लग गया और विहार में बहुत देरी हो गई। आचार्य श्री मन्नालाल जी महाराज का चातुर्मास जब रामपुरा श्री संघ को मिला। रामपुरा श्री संघ की खुशी अपार हो गई थी। जैन शास्त्रों के मर्मज्ञ ज्ञाता होने के साथ-साथ ज्योतिषशास्त्र के प्रकांड पंडित भी है। नक्षत्र लोक की जानकारी आप की अध्ययनशीलता की द्योतक है।

आपकी प्रतिभा ज्ञान संयम तप गरिमा दिन दूनी रात चौगुनी बढ़ती ही रही। फलस्वरूप वि. सं. 2002 में आपको गणीपद, वि.सं. 2016 में सम्प्रदाय के प्रवर्तक पद और संवत 2033 में आचार्य सम्राट पूज्यश्री आनंदऋषिजी म.सा ने आपको अमण संघ का उपाध्याय पद प्रदान किया।अनाथ एवं गरीब भाई बहनों के लिए तो आप करुणा के सागर ही थे। विधवा एवं विद्यार्थियों के प्रति आप सदा अति उदार दृष्टिकोण रखते थे। आपके सदुपदेश से प्रभावित होकर अनेक दानी धर्म प्रेमी सज्जन प्रत्यक्ष व परोक्ष रूप से साधर्मी सहायता का शुभ कार्य करते थे। इसी क्रम में भविष्य में भी ऐसे लोगों को निरंतर सहयोग प्रदान करते रहने की दृष्टि से गुरुदेव श्री संघों एवं सक्षम व्यक्तियों को साधर्मी सहायता प्रदान करते रहने की प्रेरणा देते रहते थे। यह पुनीत कार्य भी आपकी साधर्मी वात्सल्यता, महानता एवं हृदय की विशालता को प्रतिबिंबित करता है।यह गुरुदेव की वाणी एवं व्यवहार की ही विशेषता है कि अनेक व्यक्ति आपसे प्रभावित होते थे। क्या जैन और क्या जैनेतर, सभी संप्रदाय व धर्म के लोग समभाव से आप के प्रति श्रद्धाभाव रखते हुए आपको नमन करने के लिए आते थे। गुरुदेव का प्रेम सभी के प्रति समान रहता था। भेदभाव व संकीर्णता को तो उन्होंने अपने जीवन में कभी स्थान रखी ही नहीं।

पूज्य गुरुदेव वर्तमान पीढ़ी में उन महान संतों में से एक हैं जिनके त्यागमय जीवन, आजीवन साधुवृत्ति, वात्सल्य भाव, तप, धर्म व चारित्रिक निर्मलता के कारण भारत आज भी विश्व में महा मनीषियों का देश बना हुआ है। आप जैसी महान विभूति किसी देश, संप्रदाय अथवा समाज को बड़े पुण्योदय से प्राप्त हो सकती है। वर्तमान जैन समाज आपके त्यागमय महान व्यक्तित्व से प्राप्त करता रहा है, और कर रहा है, तथा भावी पीढ़ी भी आपके प्रति सदा श्रद्धावनत रहेगी।लगभग 94 वर्ष की उम्र पूर्ण कर 80 वर्ष की दीक्षा पूर्ण कर संवत 2042 की आसोज शुक्ला नवमी दिनांक 22 अक्टूबर, 1985 को आपका देवलोकगमन रतलाम शहर में हुआ। ऐसे महान ज्योतिर्थर, उपाध्याय, पूज्य गुरुदेव श्री कस्तुरचंदजी म.सा. की 40 वीं पुण्यतिथि पर अनन्त आस्था के साथ वंदन, नमन, श्रद्धासुमन। आपकी कृपा और आशीर्वाद सदैव संघ, समाज, एवम परिवार पर बना रहे।