
रतलाम। गत दिवस “यज्ञमाँ कला व साहित्य निलय” द्वारा “वर्तमान साहित्यिक परिदृश्य” विषय पर एक विशिष्ट विचार-विमर्श एवं परिचर्चा का आयोजन किया गया।
उक्त जानकारी देते हुए संस्था की अध्यक्ष , चित्रकार, साहित्यकार डॉ खुशबू जांगलवा ने बताया कि इस अवसर पर संगोष्ठी की मुख्य अतिथि डाॅ. सुलोचना शर्मा (पूर्व जिला शिक्षा अधिकारी), विशेष अतिथि इतिहासकार श्री नरेन्द्रसिंह पॅंवार थे। कार्यक्रम की अध्यक्षता वरिष्ठ रंगकर्मी श्री ओमप्रकाश मिश्र थे। संगोष्ठी का विषय प्रवर्तन करते हुए श्री पॅंवार ने कहा कि साहित्यकार अपने समय में घटने वाली घटनाओं को ही साहित्य के माध्यम से व्यक्त करता है। साहित्यकार युगदृष्टा भी होता है। वह अपने समय से आगे जाकर परिस्थितियों का आकलन करता है और उसका चित्र भी कथा/कहानी के माध्यम से प्रस्तुत करता है।
मुख्य अतिथि के रुप में अपने उद्बोधन में डाॅ शर्मा ने कहा कि साहित्य , समाज को व्यापक स्तर पर प्रभावित करता है। जीवन का कोई भी ऐसा क्षेत्र नहीं है जो साहित्य के दायरे में नहीं आता हो। साहित्य मनुष्य को संवेदनशील बनाता है।पूर्व प्राचार्य श्री गोपाल जोशी ने संगोष्ठी के महत्व को रेखांकित करते हुए कहा कि इस प्रकार की परिचर्चा से समाज में चेतना का संचार होता है।
कार्यक्रम के अध्यक्ष के रुप में विचार व्यक्त करते हुए श्री मिश्र ने कहा कि उपभोक्तावादी संस्कृति ने आज व्यक्ति को साहित्य से दूर कर दिया है। बच्चों के जन्म के समय से ही माता-पिता उसका कैरियर तय कर देते हैं। थोड़ा बड़ा होने पर बच्चे के सिर पर पढ़ाई का बोझ डाल दिया जाता है । जिसका परिणाम यह होता है कि बच्चे अपने आसपास के परिवेश से कटता जाता है और वह असंवेदनशील होता जाता है। समाज को यदि संवेदनशील बनाएं रखना है तो बच्चों में साहित्यिक पत्रिका पढ़ने की आदत डालना होगी। संगोष्ठी का सफल संचालन वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रकाश हेमावत ने किया।
डाॅ. खुशबू जांगलवा ने साहित्य के परिप्रेक्ष्य में बाल साहित्य व बाल कलाओं की और ध्यान केंद्रित करते हुए कहा कि देश के भविष्य को सुरक्षित करने हेतु देश की भावी पीढ़ी को गढ़ना होगा। साहित्य के द्वारा संस्कारो का सृजन करना होगा। जिसमें बाल साहित्य की महत्वपूर्ण भूमिका होनी चाहिए। वर्तमान में जो इलेक्ट्रॉनिक गैजेट्स आ गए उनसे बच्चों को दूर तो न कर सकते लेकिन उनकी उपयोगिता निश्चित करनी होगी आदि के साथ उन्होंने आभार व्यक्त किया।