

(शरद जोशी)
रतलाम।“ जब नागरिक अपनी कमाई से घर बनाते हैं, तो उस पर मनमाना संपत्ति कर उन्हें योगदान नहीं, बोझ लगता है—और यही नाराज़गी अब खुलकर सामने आने लगी है।
शहर का हर जिम्मेदार नागरिक यह समझता है कि नगर निगम को विकास कार्यों के लिए धन चाहिए। सड़कें बनें, नालियां सुधरें, पानी की व्यवस्था दुरुस्त हो, रोशनी रहे—इन सबके लिए कर जरूरी है। लेकिन सवाल तब उठता है जब कर व्यवस्था न्यायपूर्ण न लगे, पारदर्शी न दिखे और उसका बोझ असमान रूप से जनता पर डाला जाए।
रतलाम में आज यही चर्चा चौराहों से लेकर घरों तक है—संपत्ति कर वसूली की सख्ती और निर्धारण की मनमानी।
नागरिक पूछ रहे हैं कि आखिर उनकी अपनी मेहनत की कमाई से बनाए घर पर बार-बार बढ़ता कर किस तर्क पर आधारित है? एक ही क्षेत्र में समान मकानों पर अलग-अलग कर क्यों? पुराने आकलन को अचानक कई गुना बढ़ा देना किस नीति का हिस्सा है? और जब आपत्ति दर्ज कराई जाए तो सुनवाई में देरी क्यों? ये सवाल सिर्फ शिकायत नहीं, व्यवस्था पर अविश्वास का संकेत हैं।
कड़वी सच्चाई यह भी है कि शहर में मूलभूत सुविधाओं की हालत किसी से छिपी नहीं। कई इलाकों में टूटी सड़कें, जलभराव, कचरा प्रबंधन की कमी और अनियमित जलापूर्ति रोजमर्रा की समस्या है। ऐसे में जब कर का बिल बढ़ा हुआ आए, तो नागरिकों को यह ‘विकास शुल्क’ नहीं, ‘दंड’ जैसा लगता है। जनता पूछती है—पहले सेवा या पहले वसूली?
मुद्दा यहीं खत्म नहीं होता। उंगलियां निगम की अपनी संपत्तियों के प्रबंधन पर भी उठ रही हैं। शहर में निगम की कई दुकानें और भवन वर्षों पुराने किराये पर चल रहे हैं, जो बाजार दरों से बहुत कम बताए जाते हैं। आरोप यह भी सुनाई देते हैं कि कुछ जगहों पर ये दुकानें आगे ज्यादा किराये पर देकर निजी लाभ कमाया जा रहा है। अगर यह सच है, तो यह सीधा-सीधा निगम के राजस्व का नुकसान और व्यवस्था की कमजोरी है। सवाल है—जहां सख्ती होनी चाहिए वहां ढील, और जहां राहत मिलनी चाहिए वहां सख्ती क्यों?
यह समाचार किसी टकराव के लिए नहीं, जवाबदेही के लिए है। जनता कर देने से भाग नहीं रही, लेकिन वह न्याय चाहती है। पारदर्शी फॉर्मूला, सार्वजनिक जानकारी, ऑनलाइन कैलकुलेटर, समयबद्ध आपत्ति निवारण—ये कोई असंभव मांगें नहीं हैं। इसी तरह निगम संपत्तियों का नियमित किराया पुनर्निर्धारण, ई-नीलामी और सब-लेटिंग पर सख्त रोक से राजस्व अपने आप बढ़ सकता है।
निगम और उसके जनप्रतिनिधियों को यह समझना होगा कि कर वसूली ताकत से नहीं, विश्वास से चलती है। जनता को अगर लगे कि नियम सब पर बराबर लागू हैं और कर के बदले सुविधाएं मिल रही हैं, तो वही नागरिक सबसे पहले सहयोग करेगा। लेकिन अगर दोहरे मापदंड दिखेंगे, तो असंतोष बढ़ेगा ही। शहर विकास चाहता है, टकराव नहीं। पर विकास का रास्ता पारदर्शिता, समान नियम और जवाबदेही से ही निकलेगा। अब गेंद निगम के पाले में है—वह भरोसा कमाएगा या नाराज़गी बढ़ाएगा?