लोगस्स के पाठ की आराधना करने से मन को शांति प्राप्त होती है – प्रवचनकार आगमज्ञाता डॉ. समकित मुनि जी मसा

रतलाम (मप्र) । नीमचौक स्थानक में लोगस्स की महिमा विषय केप्रथम दिन प्रवचनकार आगमज्ञाता डॉ. समकित मुनि जी मसा ने धर्मसबा को सम्बोधित करते हुए कहाकि बाहर का प्रदूषण शरीर को बीमार करता है लेकिन भीतर का प्रदूषण आत्मा को बीमार कर देता है। जिनकी सुनना चाहिए अगर उनको सुनाने लग गए तो जीवन सुना-सुना हो जाएगा। यदि आपको कोई डाँटने वाला है, गलती होने पर रोकने टोकने वाला है तो यह आपका सौभाग्य है ।
जब जब कोई आत्मा राग द्वेष से युक्त होती है तो वह सहायता भी करती है एंव अनिष्ट भी कर सकती है । देवी देवताओं में राग द्वेष होता है इसलिए मनुष्य के मन में डर होता है की मैंने देवी देवता की आराधना बराबर नही की कँही देवी देवता अनिष्ट न कर दे। देवी देवताओं का राग द्वेष खत्म नही होता, इसलिये खुश होने पर वो आबाद भी कर सकते है और रूष्ट होने पर बर्बाद भी कर सकते है ।
तीर्थंकर इन बातों से पार हो जाते है वे राग द्वेष से मुक्त होते है। तीर्थंकर कभी किसी का नुकसान नही करते, उनकी पूजा करो तो भी सही आराधना करो तो भी सही, नाम लो या न लो वे रूष्ट नही होते है । लेकिन तीर्थंकर को याद करने से, आराधना करने से हमारे कर्म नष्ट हो जाते है। तीर्थंकर की एक अभिलाषा होती है की जगत के सारे प्राणी सुखी हो। तीर्थंकर देते नही है, देते हुए दिखाई भी नही देते है, फिर भी बहुत कुछ देकर जाते है। तीर्थंकर का उपकार अनंता अनन्त है, आज हम जिस धर्म की आराधना कर रहे है वो तीर्थंकर की ही देन है ।
लोगस्स की आराधना तीर्थंकर की स्तुति है । इस स्तुति से हम बहुत कुछ प्राप्त कर सकते है । यदि जिंदगी में बेस्ट बनना है, विनर बनना है जिंदगी को जायफूल बनाना है तो लोगग्स की स्तुति करे। कोई कोई व्यक्ति कहते है की सब काम में करता हूँ और नाम किसी और का हो जाता है तो लोगग्स की स्तुति करो आपकी यह शिकायत दूर हो जाती है।
आरुग्गबोहीलाभ
समझ सही हो तो पाँचवे आरे में जन्म लेने वाली आत्मा भी एक भव में तीर सकती है और समझ अगर गलत है तो चौथे आरे में जन्म लेने वाली आत्मा भी नरक में जा सकती है। समझ सही होना मतलब मन का बीमार नही होना, मन भी बीमार होता है, मन का बीमार होना मतलब हमारे विचार गलत होना। मन स्वस्थ है, तंदुरुस्त है तो जीवन तंदुरुस्त रहेगा।
बाहर का प्रदूषण भले ही हमारे नियंत्रण में न हो लेकिन भीतर के प्रदूषण को हम नियंत्रित कर सकते है। तन की बीमारी तो कुछ समय के बाद ठीक हो सकती है लेकिन मन की बीमारी का ठीक होना मुश्किल है।
मन निरोग है तो व्यक्ति अभाव व तकलीफ में भी खुश रह सकता है । मन से हारने वाला जिंदगी से हार जाता है । लोगस्स का पाठ हमें वो एनर्जी देता है की कठिन से कठिन परिस्थिति में भी हम अपने मन को विजेता बना सकते है।
एक गावँ में तीन दुखियारे थे पहले के पास धन तो बहुत था लेकिन सन्तान नही, दूसरे के पास संतान तो 7 थी लेकिन सातों की सात पागल। तीसरे के पास न ज्यादा धन और न ही कोई संतान तीनों अपने आप को संसार का सबसे बड़ा दुखी इंसान मानते है । लेकिन एक बार जब तीनों की आपस में मुलाकात हुई और एक दूसरे का दुख जाना तो वो स्वंय को खुशकिस्मत समझने लगे पहला सोचता है अच्छा है सन्तान नही है तो कोई बात नही पर पागल तो नही है। दूसरा सोचता है कम से कम मेरे संतान तो है, भले ही पागल है लेकिन फिर भी जब शाम को जब घर जाता हूँ तो बापू बापू बोलकर मुझसे लिपट जाती है । तीसरा सोचता है की अच्छा है न ज्यादा धन लूटने/चोरी होने का डर है न पागल सन्तान की चिंता ।
मतलब सबके हालात वो ही पुराने वाले है लेकिन सोच के परिवर्तन से वो दुखी से सुखी हो गए । लोगस्स का पाठ मन को मन को स्वस्थ रखने के लिए है, ये भीतर के प्रदूषण को कम करता है।
किसी ने हमें चुभता हुआ शब्द बोल दिया और हमारा मन सही है तो कम कहेंगे टेक इट इजी । सास बहू को डांटे, जेठानी देवरानी को, माँ-बाप बेटे-बेटी, भाई भाई को डांटे उस वक्त यदि डांट खाने के बाद यदि टेक इट इजी मन में सोच लिया तो झगड़े की नौबत नही आएगी।
भगवान महावीर की प्रथम शिष्या चंदनबाला की शिष्या मृणावती देर से पँहुची तो चनदनबाला ने उपालंभ दिया की देर से क्यों आई। मृणावती यँहा आने से पहले प्रभु महावीर के दर्शन करके आई थी तो वो चाहती तो सोच सकती थी की जब भगवान ने मुझे नही टोका तो गुरुणी मैया ने कैसे टोक दिया क्या ये भगवान से भी बडे है। लेकिन मृणावती ने यह सोचा की मेरी वजह से गुरुणी माता को गुस्सा आया, सारी गलती सारा कुसुर मेरा ही है । और इतने उच्च भाव आते आते मृणावती को वंही केवलज्ञान प्राप्त हो गया । और वो न केवल खुद तिरी बल्कि अपनी गुरुणी चनदनबाला को भी तिरा दिया। जब कभी बड़ो की और से उपालंभ मिले तो उसे स्वीकार करो और भूल सुधारने का प्रयास करो।