
१२ मार्च २६ चेत्र वदी नवमी के अवसर पर
जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेवजी का आज चेत्र बदी नवमी को जन्मकल्याणक दिवस है। वहीआज ऋषभदेवजी के ही ज्येष्ठ पुत्र प्रथम चक्रवर्ती भरतजी का भी जन्म दिवस है जिनके नाम पर भारत देश का नाम भारत है। अतः आज के दिन को भरतोत्सव, भारतोत्सव या” भारत पर्व “ के रूप में मनाया जाना चाहिए।
अयोध्या जो जैन तीर्थंकरों की शाश्वत जन्मभूमि है। जहां से भूतकाल के २४ तीर्थंकर का जन्म हुआ ओर वर्तमान काल के आदिनाथजी, अजितनाथजी, सुमति नाथजी, अभिनंदनजी तथा अनंतनाथजी की जन्मभूमि है। तथाप्रथम तीर्थंकर आदिनाथजी के भरत आदि १०० पुत्रों व दो पुत्रियों ब्राह्मीसुंदरी की जन्मभूमि भी अयोध्या ही है। रामचंद्रजी का जन्म, काल २० वे तीर्थंकर केसमय की बात है । ओर महाभारत का काल २२ वे तीर्थंकर नेमिनाथजी के समय की बात है।
आदिनाथजी के समय दस प्रकार के कल्पवृक्ष मालांग, भोजनांग, भाजनांग तुर्यांग ,सूर्यांग, पानाएंग आदि थे। जिससे इच्छित वस्तुओं की प्राप्ति हो जाती थी। धीरे धीरे कल्पवृक्ष समाप्त होने लगे लोगों का जीवनयापन करना मुश्किल हों गया। तब राजकुमार आदिकुमार ने असि (शस्त्र चलाना), मसि, (लेखनकला), कृषि (खेती करना), वाणिज्य( व्यापार करना) , शिल्पक़ला ओर विद्या के द्वारा लोगों को जीवन जीना सिखाया।
७२ कला के प्रणेता ऋषभदेवजी ने अपनेपुत्रों को अनेक कलाओं में पारंगत किया। भरतजी को रत्न परिक्षण, आयर्वेद, अर्थशास्त्र धुड़सवारी आदि की शिक्षा दी। अपनी पुत्री ब्राह्मी को लेखन कला सिखायी जो ब्राह्मी लिपि के नाम से प्रसिध हुई। बेटी सुन्दरी को अंक कला सिखाई।*
एक बार ऋषभ देव जी के जन्मदिवस के अवसर पर अप्सरा नर्तकी नीलांजना नृत्य कर रही थीं कि नृत्य करते मृत्यु को देख वेराग्य ले लिया और अपना राजपाट सभी पुत्रों को सोपकर भरत जी को अयोध्या का राजकाज देकर दिक्षा ले वन को चले गए ।
भरतजी के जन्म से पूर्व उनकी माता नंदा देवी को छः शुभ स्वप्न दिखाई दिए थे- सुमेरु पर्वत, सूर्य, चंद्रमा, सरोवर में हंस, धंसी हुई पृथ्वी, ओर चंचल लहरो वाला समुद्र।.. जिसका अर्थ भावी तीर्थंकर अवधिज्ञानी राजा ऋषभदेव ने बताया कि हमारा पुत्र महाप्रतापी, चक्रवर्ती वीर संसार समुद्र को पार करने वाला होगा। जन्मलेते ही बालक ने दोनो हाथों से पृथ्वी का आलिंगन किया। जिससे निमित्त ज्ञानियों नेकहा कि वे समस्त पृथ्वी के अधिपति होंगे।
उनकी हथेली चक्रादि शुभ चिन्हों से शोभायमान थी उनके पांव में भी चक्र, छत्र, तलवार आदि चौदह रत्नों के चिह्न थे । वे अत्यंत बलशाली ,सुन्दर दिव्य पुरुष थे पराक्रमी राजा भरत ने अपने राज्य को सुचारु रूप से चालाया। एक दिन वे राज्यसभा में बेठे थे कि उन्हें तीन ख़ुशियाँ एक साथ प्राप्तहुई। आयुध शाला में चक्र रत्न की प्राप्ति , मुनिराज ऋषभदेव को केवलज्ञान की प्राप्ति ओर पुत्र रत्न की प्राप्ति। राजा भरत ने धर्म को प्रधानता दे वे सर्वप्रथम मुनिराज ऋषभदेवजी की वंदना को गये। फिर आयुध शाला में चक्ररत्न देखने के बाद पुत्र प्राप्ति का उत्सव मनाया।
१२ चक्रवर्ती में प्रथम चक्रवर्ती भरत जी थे। चक्रवर्ती का अपार वेभव होता है। उन्हें १४ रत्न व नो निधिया दशाँग भोग आदि प्राप्त होते है वे छः खंड के अधिपति होते है। निधि ६ योजन चोडी १२ योजन लंबी ओर ८ योजन गहरी गाड़ी की आकृति की निधिपाल देवोंद्वारा सुरक्षित , चक्रवर्ती के मनोरथ को पूर्ण करने वाली ,जन जन की उपकारक ,एक एक हज़ार यक्षदेवों द्वारा सेवित ग्रहपति रत्न के अधीन रहने वाली निधि कही जाती है। नानाप्रकार के पदार्थ देने वाली कालनिधि, भोज्य पदार्थ देने वाली महाकाल निधि, आयुध पदार्थ वाली माणककाल निधि, आभरण देनेवाली पिंगलनिधि, मंदिर प्रदाता नेसर्ग़ निधि, वस्त्र प्रदाता पद्मनिधि, पाण्डुक निधि से धान्य, शँख निधि से वादित्र , ओर रत्ननिधि से सब प्रकार के रत्न प्राप्त होते है। चक्रवर्ती ,बलदेव व नारायण रत्न का धारण करते है।*
इस प्रकार समस्त लोक सम्मान से भरा उनका वह भारत के प्रथम राजा होने के साथ साथ प्रथम चक्रवर्ती भी थे। उन्होंने अपनी धर्मवीरता, धर्मपालन और अधिकारवादी राजनीति के लिए विख्यात थे। भारत की अद्भुत संस्कृति और उसकी भूमि को भरत पुत्र की आवाज से जोड़ा जाता है।
समस्त सिहासनो को जीतने वाला सेनापति रत्न, हर्म्यपति (गृहपति भंडारी) रत्न, पुरोहित रत्न धर्मानुष्ठान करवाने वाला, स्थापित रत्न, महल मंदिर स्थापित करने वाला, स्त्री रत्न, गजपती रत्न अश्व रत्न ये सात चेतन रत्न ओर सात अचेतन रत्न होते हैं। चक्र रत्न एक हज़ार आरे वाला, अत्यंत तेजस्वी, राजा के दिग्विजय के लिए चलते समय आगे चलता है। जिसे क़ोई रोक नही सकता। जो सम्पूर्ण षट्खंड का राज्य जीतने पर ही नगर में प्रवेश करता है। आपत्ति केसमय सेना की रक्षा करने वाला सूर्यप्रभ छत्र रत्न सेना में आनंद व जोश भरने वाला भद्रमुख खड्ग रत्न ख़ंदक, चट्टानो को समतल करने वाला प्रबद्ध दंग दंड रत्न।
अंधकार को दूर करने वाला कांकिनी रत्न, इच्छित पदार्थदेने वाला चूड़ामणि रत्न, ओर नदियों, समुद्र आदि को सुरक्षित पार करने वाला चर्म रत्न। इस प्रकार अनेक रतनो ओर निधियो से विभूषित राजा भरत ने षट्खंड पृथ्वी पर राज्य कर प्रथम चक्रवर्ती कहलाए।*
कहते हैं “भरतजी धर में ही बेरागी” ओर इतनी अपार धन सम्पदा, बेभव को क्षणभंगुर मान क्षणभर में त्याग कर निर्ग्रंथ मुनि बन सिद्धपद को प्राप्त कर भगवान बन गये। जैन मन्दिरों में भरत भगवान की निर्ग्रंथ प्रतिमाये देखने को मिलती है। ओर प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेवजी के पिता चोदहवे मनु अंतिम कुलकर राजा नाभिरायजी के नाम से “अजनाभ वर्ष” कहलाने वाला देश ऋषभदेवजी के पुत्र चक्रवर्ती भरत के नाम से“भारत वर्ष” कहलाने लगा। दिल्ली के अक्षर धाम के बगीचे में भरतजी की प्रतिमा लगी है, जिसके नीचे लिखा है “जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर ऋषभ देवजी के प्रथम चक्रवर्ती पुत्र जिनके नाम से भारत देश का नाम भारत पड़ा”।*
भारतपर्व की बहुत बहुत बधाई।
पुष्पा पांड्या
लेखिका, वरिष्ठ चित्रकार
mob. 8839292376*