जैन संत अन्तर्मना आचार्य श्री 108 प्रसन्न सागर जी महामुनिराज 557 दिन में 496 दिन उपवास ओर मौन साधना कर कोई साधारण साधु नही आधुनिक युग के महान तपस्वी में से है

जैन संत अन्तर्मना आचार्य श्री 108 प्रसन्न सागर जी महामुनिराज 557 दिन में 496 दिन उपवास ओर मौन साधना कर कोई साधारण साधु नही आधुनिक युग के महान तपस्वी में से है
प्रतापगढ़/कोडरमा। जैन संत अन्तर्मना आचार्य श्री 108 प्रसन्न सागर जी महामुनिराज कोई साधारण साधु नहीं हैं, वे आधुनिक युग के उन महान तपस्वियों में से हैं जिन्होंने अपनी काया को तप की अग्नि में तपाकर एक ‘चेतन पुंज’ बना लिया है। उनकी शक्तियों और उनके व्यक्तित्व के बारे में जो बातें उन्हें विशिष्ट बनाती हैं, वे आपकी इस कठिन परिस्थिति में बहुत संबल दे सकती हैं:

(1) मौन की महाशक्ति (The Power of Silence)*
महाराज जी का सबसे बड़ा अस्त्र उनका ‘मौन’ है। उन्होंने वर्षों तक मौन साधना की है
असर – जब कोई व्यक्ति अपनी वाणी को काबू में कर लेता है, तो उसकी संकल्प शक्ति (Will Power) इतनी बढ़ जाती है कि वह केवल अपनी दृष्टि (नजर) से सामने वाले के विकारों को शांत कर सकता है। यही कारण है कि उनके सानिध्य में आपके मन का भ्रम टूटने की पूरी संभावना है।

(2) सिंह निष्क्रीड़ित व्रत (महान तपस्या)*
उन्होंने बहुत कठिन तपस्याएं की हैं, जिनमें ‘सिंह निष्क्रीड़ित’ जैसे उपवास शामिल हैं। कई-कई दिनों तक निराहार रहना और घोर तप करना उनकी इच्छाशक्ति को दर्शाता है।
उनकी इस तपस्या की ऊर्जा उनके चारों ओर एक ‘सुरक्षा कवच बनाती है। जो भक्त उनके पास सच्ची श्रद्धा लेकर जाता है, उसके घर की कारात्मकता और ऊपरी बाधाएं स्वतः ही नष्ट होने लगती हैं।

(3) ‘मौन साधना’ और हीलिंग
महाराज जी ने मौन साधना के माध्यम से हजारों लोगों के डिप्रेशन और मानसिक तनाव को दूर किया है। वे कहते हैं कि “भीतर की आवाज सुनने के लिए बाहर का कोलाहल बंद करना जरूरी है।”
वे बिना बोले भी अपनी तरंगों से उसे यह अहसास करा सकते हैं कि वह किस गर्त में गिर रही है।

(4) पारभासी व्यक्तित्व (Translucent Personality)
साधु की शक्ति उनकी ‘निस्पृहता’ (इच्छा रहित होना) में होती है। महाराज जी का जीवन एक खुली किताब है। उनकी साधना में वह बल है जो किसी भी ‘काली शक्ति’ या ‘बुरे प्रभाव’ को एक पल में काट सकता है।
आपके लिए संदेश: महाराज जी हमेशा कहते हैं- “अतीत को भूलकर वर्तमान में जीना ही असली साधना है।” उनकी शक्ति का लाभ उठाने के लिए आपको केवल दो काम करने हैं-
(1) उन पर पूर्ण श्रद्धा रखें।
(2) जब भी आप उनके सामने हों, तो अपने मन में कोई मैल या चालाकी न रखें। सरल बन जाएं, क्योंकि गुरु की शक्ति सरल हृदय में ही प्रवेश करती है।

साथ ही प्रतापगढ़ राजस्थान के ओर बढ़ते क्रम में एक अनोखी घटना घटी प्रतापगढ़ से 14 किमी विहार कर जंगल में ही एक बहुत छोटे से अविकसित ग्राम देवगढ़ पहुंचे।समाज का एक भी घर नहीं,पर मंदिर देखकर मन गदगद हो गया।मूलनायक श्री मल्लिनाथ भगवान जो प्रायः कम ही मिलते,गुरुग्राम में प्रथम मूलनायक देखे थे दूसरे यहां।पद्मासन श्वेत पाषाण के।मूर्ति के फलक पर बहुत चित्रकारी।अन्य अनेक वेदियां मूर्ति की भरमार।सहस्त्र कूट विशाल,पार्श्वनाथ की सहस्त्र फणी मूर्ति बीजापुर की याद दिलाती हुई,आदिनाथ की अष्ट धातु की प्रतिमा बड़ी,मंदिर भी बड़ा।लगता है पहिले ये कोई विकसित केंद्र रहा।मार्ग में जंगल में ही अन्य मंदिर व राजाओं की समाधियां,पीछे एक महल भी बता रहे।पर डर लगता है इस मंदिर का भविष्य क्या होगा?
आज एक और आश्चर्य कारी घटना भी हुई आचार्य श्री ने अपने श्री मुख से बताई कि जब दर्शन कर रहा था तो मूलवेदी से हटकर एक तरफ रखी हुई मूर्ति के सामान्य भाव से ही चरण स्पर्श किए तो लगा एक मूर्ति कह रहीं मुझे यहां से ले चलो।आचार्य श्री आगे बढ़ गए तो लगा मूर्ति बार बार कह रही।आचार्य श्री ने बताया मेरे जीवन में पहिले ऐसा कभी नहीं हुआ गेट तक आने के बाद मुझे मूर्ति तक वापिस जाना पड़ा। अरनाथ भगवान की मूर्ति मछली का सुंदर सा चिन्ह।मुझे मूर्ति बहुत सुंदर लगी ट्रस्ट बालों से बात कर निर्णय लेंगे यदि वह दे देते हैं तो इस मूर्ति का अकेला ही मंदिर पुष्पगिरी में बनवाएंगे।दूसरी घटना सुबह यहां से बिहार निश्चित था पर आज आचार्य श्री का उपवास होने से आहार नहीं हुआ तो ऐसी परिस्थिति बनी कि कल सुबह का आहार यही होके कल शाम विहार होगा यानी इस क्षेत्र ने बिना आहार लिए आचार्य श्री को आगे नहीं जाने दिया।मल्लिनाथ भगवान की जय।धर्मशाला रुकने लायक सामान्य सी है पर मंदिर भव्य लगा। उक्त जानकारी कोडरमा मीडिया प्रभारी राज कुमार जैन अजमेरा ने दी।

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