भाटपचलाना/रतलाम । परम पूज्य गच्छाधिपति आचार्य देव श्री ऋषभचंद्र सुरीश्वरजी म.सा. के सुशिष्यरत्न प.पू. मधुरवक्ता मुनिराज श्री रजतचंद्र विजयजी म.सा. का भाट पचलाना नगर में मंगल प्रवेश हुआ । जगह जगह गहूली करते हुए नगर के मुख्य मार्गो से होते हुए श्री आदिनाथ जैन मंदिर पहुंचे। दर्शन वंदन कर जुलूस धर्मसभा में परिवर्तित हुआ।
मुनि श्री ने धर्मसभा मे प्रवचन देते हुए कहा प्रभु ने जो छोड़ा उसे नहीं मांगना है प्रभु ने जो पाया है उसे पाना है, यही प्रार्थना का सार है । व्यक्ति छोटी-छोटी इच्छापूर्ति करते हुए संसार में ही फंसा रहना चाहता है जबकि उन इच्छाओं से मुक्त होकर संसार कारागृह से बाहर आने का प्रयास होना चाहिए।
कठिनाइयों को सहने वाला ही सफलता का स्वाद प्राप्त करता है। छोटी-छोटी बातों में घुस्सा ना करें। सहन करने वाला मूल्य को प्राप्त होता है। व्यक्ति विचलित न बने धैर्यता से जीवन यापन करें। संतोषी नर सदा सुखी रहता है। इस विषय पर मेघकुमार मुनि का प्रभावशाली प्रसंग भी सुनाया। अपनी धाराप्रवाह शैली से प्रवचन के बीच मालवरत्न मुनि श्री ने चेत्र वदि अष्टमी आदिनाथ प्रभु के जन्म कल्याणक को महोत्सव के रूप में मनाने की प्रेरणा सकल श्री संघ को दी। मुनिश्री ने कहा कि नगर के मुलनायक प्रभु आदिनाथ दादा है इसलिए जन्म कल्याणक अवसर पर हर साल यह आयोजन हो तथा इस परम्परा की शुभ शुरुआत बनी रहे।
श्री संघ ने धर्मसभा में ही जन्मोत्सव मनाने का तय किया एवं महाअभिषेक, वरघोड़ा, सामूहिक आरती पूजन आदि के चढ़ावे बोलाये गए। दादा आदिनाथ का अभिषेक के पश्चात वरघोड़ा निकाला जावेगा एवं दादा आदिनाथ की 108 दीपक से महाआरती उतारी जावेगी एवं श्री संघ द्वारा प्रभावना का वितरण किया जावेगा।