
-नरेन्द्रसिंह पंवार (गढ़ीभैंसोला)
Mob. 925291-95731
मध्य कालीन भारतीय इतिहास वीरता, संघर्ष और बलिदान की अनुपम गाथाओं से परिपूर्ण है। इन्हीं में एक अत्यंत महत्वपूर्ण, किंतु अपेक्षाकृत उपेक्षित घटना है — धर्मत (फतेहाबाद/चंद्रावतीगंज) का युद्ध, जो 15 अप्रैल 1658 को लड़ा गया । यह युद्ध केवल एक सैन्य संघर्ष नहीं था, बल्कि मुगल साम्राज्य के उत्तराधिकार को लेकर उत्पन्न आंतरिक संघर्ष का परिणाम था, जिसने भारतीय इतिहास की दिशा को निर्णायक रूप से प्रभावित किया।
इतिहास प्रायःविजेताओं के दृष्टिकोण से लिखा जाता है, इसी कारण धर्मत के इस युद्ध को वह स्थान नहीं मिल पाया, जिसका यह वास्तविक अधिकारी था। फिर भी लोक परंपराओं, चारण-काव्य और ऐतिहासिक संदर्भों में यह युद्ध आज भी जीवंत है।
यह युद्ध मुगल उत्तराधिकार के संघर्ष का एक महत्वपूर्ण चरण था । एक ओर शाही सेना थी, जिसका नेतृत्व जोधपुर के महाराजा जसवंतसिंह जी कर रहे थे, वहीं दूसरी ओर औरंगजेब और मुराद की संयुक्त सेना थी।यद्यपि यह संघर्ष मुगल सत्ता के भीतर का था, किंतु इसका प्रभाव सम्पूर्ण भारत, विशेषकरराजस्थानऔरमालवाक्षेत्रपरपड़ा।
जब युद्ध की परिस्थितियाँ अत्यंत विषम हो गईं, तब राजपूत सरदारों ने महाराजा जसवंतसिंहजी की सुरक्षा को सर्वोपरिमानते हुए उन्हें युद्धभूमि से हटाने का निर्णय लिया । इस ऐतिहासिक क्षण का सुंदर चित्रण कवि कुम्भकर्ण ने अपने काव्य में किया—
हठनकरह महाराज, अबममदिया अरंगपाट।
गिरामेघगं भीरवत, नभवाणी वैराट॥
छत्रधरह सुजाण को, रतनसिंह सिरअत्र।
छत्रधरन हिन्दुवान को, नृपति धीरजधर॥
इसका आशय है कि महाराजा जसवंतसिंहजी से आग्रह किया गया कि वे हठन करें और युद्ध का सम्पूर्ण दायित्व वीर रतनसिंहजी को सौंप दें। आप राठौड़ वंश के गौरव हैं, अतः आपकी रक्षा आवश्यक है। यह वर्णन एक प्रकार की दैवी प्रेरणा जैसा प्रतीत होता है।
इस निर्णायक मोड़ पर युद्ध का सम्पूर्ण नेतृत्व रतलाम के महाराजा रतनसिंहजी को सौंपा गया। यही वह क्षण था जब रतलाम ने केवल एक रियासत नहीं, बल्कि पूरे राजपूत स्वाभिमान और परंपरा का भार अपने कंधों पर उठा लिया । महाराजा रतनसिंहजी ने विपरीत परिस्थितियों में भी अदम्य साहस और शौर्य का परिचय दिया। उनके नेतृत्व में राठौड़, चौहान, भाटी, झाला, गोहिल सहित अनेक राजपूत वंशों के वीरों ने अपने प्राणों की आहुति दी।
इस युद्ध में केवल सैनिक ही नहीं, बल्कि ब्राह्मण, भाट, चारण, मुस्लिम तथा अन्य समाजों के लोग भी सम्मिलित हुए। इस प्रकार यह युद्ध सामाजिक समरसता और सामूहिक बलिदान का अद्वितीय उदाहरण बन गया।
महाराजा रतनसिंह जी अंतिम क्षणतकरण भूमि में डटे रहे। उनके शरीर पर 26 तीरों के घाव और लगभग 80 तलवारों के वार पाए गए। उन्होंने वीरगति को स्वीकार किया, किंतु युद्ध भूमि से पीछे हटना स्वीकार नहीं किया। महाराजा रतनसिंहजी की वीरता केवल भारतीय परंपराओं तक सीमित नहीं रही, बल्कि विदेशी इतिहासकारों ने भी उसे अद्वितीय माना।
अंग्रेज इतिहासकार कर्नल जेम्स टॉड ने उनके पराक्रम की प्रशंसा करते हुए लिखा—“Of all the deeds of heroism performed on that day, those of Ratan of Ratlam, by universal consent, are pre-eminent; and are wreathed in immortal rhyme by the bard Roop Rao Ratan.”
अर्थात उस दिन के सभी वीरतापूर्ण कार्यों में रतलाम के रतनसिंह जी का पराक्रम सर्वसम्मति से सर्वोच्च था, जिसे चारण कवियों ने अमर काव्य में स्थान दिया।
धर्मत का यह युद्ध केवल एक ऐतिहासिक घटना नहीं, बल्कि त्याग, स्वाभिमान और वीरता का जीवंत प्रतीक है। यद्यपि युद्ध का परिणाम अनुकूल नहीं रहा, किन्तु महाराजा रतनसिंहजी के अद्वितीय बलिदान ने रतलाम को इतिहास में अमर कर दिया । रतलाम और सम्पूर्ण मालवा क्षेत्र को इस बात पर सदैव गर्व रहेगा कि उनके शासकनेरण भूमि में वीर गति को स्वीकार किया, परंतु कभी पलायन नहीं किया।
महाराजा रतनसिंह जी का बलिदान आज भी प्रेरणा देता है — कि सच्चावीर वही है, जो अंत तक अपने कर्तव्य और स्वाभिमान पर अडिग रहता है।
लेखक परिचय- नरेन्द्रसिंह पंवार (गढ़ीभैंसोला)- M-925291-95731

नरेन्द्रसिंह पंवार एक समर्पित शोधकर्ता, इतिहास प्रेमी एवं परमार (पंवार) वंश की गौरवशाली परंपरा के सजग संवाहक हैं। आप महाराजा श्री रतनसिंहजी ट्रस्ट के संस्थापक एवं सचिव के रूप में सामाजिक, ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक चेतना के संरक्षण में निरंतर सक्रिय हैं।
आपका लेखन विशेषतः मध्यकालीन भारतीय इतिहास के उन स्वर्णिम अध्यायों को उजागर करता है, जोवीरता, त्याग और स्वाभिमान की अनुपम गाथाओं से परिपूर्ण हैं। आपने रतलाम राज्य के संस्थापक महाराजा श्री रतनसिंहजी के जीवन, संघर्ष एवं बलिदान पर आधारित एक महत्वपूर्ण ग्रंथ की रचनाकर इतिहास के एक गौरवपूर्ण अध्याय को सजीव रूप प्रदान किया है। इसके अतिरिक्त, आपने परमार (पंवार) राजवंश के इतिहास पर लगभग 1200 पृष्ठों का एक विस्तृत, शोधपरक एवं प्रामाणिक ग्रंथ भी लिखा है, जो इस वंश की ऐतिहासिकता, वंशपरंपरा एवं सांस्कृतिक विरासत को गहराई से प्रस्तुत करता है।
आपका लेखनन केवल इतिहास के पुनर्स्मरण का माध्यम है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का सशक्तस्रोत भी है।