

30 मई हिन्दी पत्रकारिता दिवस पर विशेष
डॉ. मोहन परमार
साहित्यकार एवं पत्रकारिताविद्
रतलाम मो. 9589250146
आज भारत की पुष्पित – पल्लवित रंग बिरंगी चमकदार हिन्दी पत्रकारिता है । उसके अतीत की पृष्ठभूमि बहुत संघर्षपूर्ण दौर से गुजर रही थी । एक तरफ आंग्ल (अंग्रेजी) दूसरी तरफ बांग्ला भाषा थी । यहां एक बात महत्वपूर्ण है कि भारत में पत्रकारिता की शुरूआत जेम्स आगस्टन हिक्की ने 29 जनवरी 1780 को ‘कलकत्ता जनरल एडवाईजरÓ या ‘बंगाल गजट’ अथवा कुछ लोग ‘हिक्की गजट’ भी कहते है । इसके 46 वर्ष पश्चात 30 मई 1826 को कानपुर निवासी पंडित युगल किशोर शुक्ल ने कलकत्ता के अमड़ा तल्ला के मकान नं. 37 में स्थित मार्तण्ड छापाखाने (प्रिटिंग प्रेस) से साप्ताहिक ‘उदन्त मार्तण्ड’ का प्रकाशन प्रारम्भ किया।
इसके पूर्व हिन्दी के पहले समाचार पत्र के सम्बंध में एक अवधारणा बनी हुई थी हिन्दी का पहला समाचार पत्र ‘बनारस अखबार’ 1845 है। किन्तु भारतेन्दु हरिचन्द्र के फुफेरे भाई राधाकृष्ण दास ने ‘हिन्दी भाषा के सामाजिक पत्रों का इतिहास’ लिखा । उन्होंने शिवप्रसाद सितारे हिन्द ने ‘बनारस अखबार’ को पहला अखबार माना था। सन् 1931 तक यही अवधारणा मत सर्वत्र मान्य रहा। किन्तु मार्डन रिव्यू और प्रवासी के उपसम्पादक श्री ब्रजेन्द्र नाथ बद्योधाप्याय को बांग्ला पत्र को खोजते- खोजते राधाकांत देव पुस्तकालय में ‘उदन्त मार्तण्ड’ की फाईल मिली । तब हिन्दी पत्रकारिता का इतिहास 1945 से खिसक कर 1826 तक पहुंच गया। बाबु ब्रजेन्द्र नाथ को इस खोज को प्रकाश में लाने का कार्य पं.बनारसीदास चतुर्वेदी के ‘विशाल भारत’ ने किया ।
सन् 1823 में ब्रिटिश सरकार ने अखबार तथा मुद्रण सम्बंधी नए कानून बनाए थे । इसके अनुसार अखबार प्रकाशित करने के पूर्व संचालक को लाइसेंस लेना पड़ता था। श्री युगल किशोर शुक्ल ‘उदन्त मार्तण्ड’ के लिए 16 फरवरी 1826 को मंजुर कर इन्हें लाइसेंस प्रदान कर दिया गया। तत्कालीन समय में कई अखबारों के मुख पृष्ठ कुछ खास श्लोकन छपतेे थे। ठीक उसी तरह फुल स्केप साईज के ‘उदन्त मार्तण्ड’ के मुख पृष्ठ पर संस्कृत की यह एक लम्बी पंक्ति मुद्रित रहती थी।
दिवाकांतकांति विना ध्वांतांत च चाप्रोति त द्वज्जगत्य लोक: ।
समाचार सेवामृत जप्तमांतु न शक्नोति तमाकरोमीति यत्न: ।।