समता और आत्मबोध से ही मोक्ष का मार्ग संभव – मुनिश्री निर्णय सागर जी म.सा.

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रतलाम 20 अप्रैल । चंद्रप्रभ दिगंबर जैन मंदिर में मुनि श्री 108 निर्णय सागर जी मसा एवं क्षुल्लक श्री 105 तत्व सागर जी मासा ससंघ विराजे है। आयोजित धर्मसभा में मुनिश्री 108 निर्णय सागर जी महाराज ने अपने प्रवचन में आत्मा के वास्तविक स्वरूप एवं समता भाव के महत्व पर विस्तार से प्रकाश डाला।
मुनिश्री ने कहा कि आचार्य गुरुवरों द्वारा रचित समयसार ग्रंथ में आत्मा के स्वरूप का अत्यंत गहन और वैज्ञानिक विश्लेषण किया गया है। यदि आचार्य गुरुवर नहीं होते, तो आत्म तत्व की ऐसी सूक्ष्म समझ प्राप्त करना अत्यंत कठिन होता। उन्होंने प्रत्येक गाथा और सूत्र के माध्यम से आत्मा को पहचानने का मार्ग प्रशस्त किया है।
प्रवचन के दौरान मुनिश्री ने आत्मा की श्रेष्ठता को समझाते हुए उदाहरण दिया कि जैसे ताश के बावन पत्तों में “इक्का” सबसे श्रेष्ठ माना जाता है, उसी प्रकार समस्त जीवों में आत्मा का स्वरूप सर्वोपरि और सर्वोच्च है। उन्होंने कहा कि मनुष्य जब संसार से विरक्त होकर भगवान की भक्ति में लीन होता है, तब वह पहले ‘दास’ भाव में आता है, फिर धीरे-धीरे ‘सोहम्’ (मैं वही हूँ) की अनुभूति तक पहुँचता है। यह अवस्था आत्मा और परमात्मा के एकत्व का अनुभव कराती है।
मुनिश्री ने दूध और पानी के उदाहरण से समझाया कि जैसे दूध में मिला पानी विशेष प्रक्रिया से अलग होकर “खोया” बन जाता है, उसी प्रकार आत्मा भी शरीर और कर्मों के संयोग से अलग होकर अपनी शुद्ध अवस्था को प्राप्त कर सकती है।
उन्होंने कहा कि जन्म और मृत्यु वास्तव में आत्मा के नहीं, बल्कि शरीर के धर्म हैं। आत्मा नित्य, शाश्वत और अविनाशी है। संसार में जीव अपने कर्मों के अनुसार चार गतियों—मनुष्य, देव, तिर्यंच और नरक—में जन्म लेता है।मुनिश्री ने स्पष्ट किया कि इस सृष्टि को किसी ने बनाया नहीं है, बल्कि यह अनादि-अनंत है और जीव अपने कर्मों के अनुसार ही सुख-दुःख का अनुभव करता है। समता भाव के अभाव में ही जीव दुखी होता है।
105 क्षुल्लक तत्व सागर जी मसा.ने बताया जैविक खाने पर जोर देते हुए बताया कि कैंसर जैसी बीमारी से बचने के लिए जैविक अनाज, ज्वार, बाजरा,गेहूं हरी सब्जियां खाना चाहिए अपने ही नहीं पूरे परिवार को बच्चे, बड़े बूढ़े सबको अपने आहार में जैविक भोजन सम्मिलित करना चाहिए एवं देसी गाय का दूध पीना चाहिए जिससे कैंसर जैसी घातक बीमारी से बचे।
प्रवचन के अंत में मुनिश्री ने सभी श्रद्धालुओं को समता, संयम और आत्मचिंतन अपनाने की प्रेरणा दी, जिससे आत्मकल्याण और मोक्ष का मार्ग प्रशस्त हो सके। उक्त बात अपने प्रवचन में कही।
जिसमें चंद्रप्रभ दिगंबर श्रावक संघ सहित समाज जन उपस्थित थे।

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