परशुराम के वास्तविक उत्तराधिकारी और चाणक्य की बुद्धि के वारिस थे बाजीराव पेशवा- डॉ. मुरलीधर चांदनीवाला

मप्र परशुराम कल्याण बोर्ड ने किया पेशवा बाजीराव की पुण्यतिथि पर किया व्याख्यान का आयोजन

रतलाम । बाजीराव पेशवा परशुराम के वास्तविक उत्तराधिकारी, चाणक्य की बुद्धि के वारिस थे। द्रोणाचार्य की व्यूह रचना को सीधे तौर पर अंगीकार करने वाले योद्धा भी बाजीराव ही थे। उन्हें शिवाजी द्वितीय भी कहा जाता है। वे शिवाजी को अपना गुरु मान कर जीवन भर उनके पदचिह्नों पर चले। उन्होंने मात्र 20 वर्ष की आयु में 41 प्रमुख युद्ध लड़े और सभी में अपराजेय रहे। उनका नाम विश्व में सर्वाधिक युद्ध लड़ने वाले और अपराजेय रहे योद्धाओं में सबसे ऊपर आता है।
यह बात साहित्यकार एवं वेदों के अनुवादक डॉ. मुरलीधर चांदनावाला ने कही। वे बाजीराव पेशवा की पुण्यतिथि पर मप्र परशुराम कल्याण बोर्ड द्वारा सर्किट हाउस में आयोजित कार्यक्रम में व्याख्यान दे रहे थे। महज 39 वर्ष की आयु में ही तत्कालीन 70 प्रतिशत भारत पर अपना नियंत्रण स्थापित कर लिया था फिर भी वे कभी राजगद्दी पर नहीं बैठे। वे बहुत अच्छे घुड़सवार और तलवारबाज थे। चलते-चलते रणनीति बना लेते थे, अपनी शर्तों पर मनोवैज्ञानिक युद्ध लड़ते थे। उन्होंने कभी किसी को मौका ही नहीं दिया कि वह अपने आयुद्ध भंडार का उपयोग कर सके।

‘इतिहास में ऐसे योद्धा के बारे में नहीं पढ़ाना अफसोस की बात’
बाजीराव कहते थे कि पहले अपने मन में युद्ध जीतना पड़ता है और उसके बाद मैदान में। मन में हारा व्यक्ति मैदान में नहीं जीत सकता। होल्कर, पंवार, सिंधिया, गायकवाड़ घरानों की स्थापना भी उन्हीं की देन है। 1700 में जन्मे बाजीराव का निधन 28 अप्रैल, 1740 को निमाड़ क्षेत्र के खरगोन के बेड़िया गांव के पास नर्मदा तट पर रावेरखेड़ी में हुआ। उनके जाने के बाद मराठा साम्राज्य का विस्तार उनके चारों पुत्रों ने किया। यह अफसोस की बात है कि ऐसे ऐसे महान योद्धा के बारे में हमें इतिहास में कभी पढ़ाया नहीं गया। हमें नई पढ़ी को ऐसे योद्धाओं से परिचय कराने की आवश्यकता है।

‘ब्राह्मणों का इतिहास योद्धाओं का इतिहास है’
साहित्यकार चांदनीवाला ने कहा कि यदि बाजीराव पेशवा के ऐसा इसलिए कर पाए क्योंकि वे ब्राह्मण थे। हमारे यहां यह माना जाता है कि ब्राह्मण का काम सिर्फ ज्ञान अर्जन, कर्मकांड और पूजा-पाठ करवाने का है जो पूर्णतः सही नहीं, ब्राह्मण वास्तव में योद्धा है। ब्राह्मणों का इतिहास योद्धाओं का इतिहास है। परशुराम जी ऋषि थे जिन्होंने ब्राह्मणों से सबसे पहले कहा था कि योद्धा बनो, योद्धा में ही भगवान का निवास है। ऋषियों ने भी यही प्रार्थना की है कि हमें योद्धा बना। अगर विचारों से कोई युद्ध लड़ सकता है तो वह केवल ब्राह्मण है। क्रांति और सृजन विचारों से ही संभव है। परशुराम कल्याण बोर्ड ने यह जो वैचारिक शुरुआत की है वह आगे भी चलते रहना चाहिए।

नविनयुक्त पदाधिकारियों का किया अभिनंदन
इससे पूर्व सर्वप्रथम मुख्य अतिथि डॉ. चांदनीवाला, मप्र परशुराम कल्याण बोर्ड के नवनियुक्त उज्जैन संभाग प्रभारी अनुराग लोखंडे, रतलाम जिला प्रभारी अजय तिवारी, विधि प्रमुख एवं रतलाम अभिभाषक संघ के अध्यक्ष राकेश शर्मा तथा जिला प्रचार प्रमुख नीरज कुमार शुक्ला का पुष्पमाला एवं दुपट्टा पहनाकर स्वागत किया। स्वागत बोर्ड के सुशील कुमार दुबे, मिथिलेश मिश्रा, प्रभाकांत उपध्याय एवं हेमंत तिवारी सहित अन्य ने किया। ब्रह्न्न महाराष्ट्र परिषद की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में सदस्य बनाए जाने पर सामाजिक कार्यकर्ता मिलिंद करंदीकर का अभिनंदन भी किया गया। तत्पश्चात संभाग अध्यक्ष लोखंडे ने भी संबोधित किया। उन्होंने पर्यावरण संरक्षण के लिए अधिक से अधिक पौधारोपण का आह्वान भी किया।
ये उपस्थित रहे।

संचालन जिला प्रचार प्रमुख पत्रकार नीरज कुमार शुक्ला ने किया। आभार विधि प्रमुख राकेश शर्मा ने व्यक्त किया। व्याख्यान में प्रतिभा चांदनीवाला, डॉ. गीता दुबे, ओमप्रकाश मिश्र, सुरेश चंद्र करमरकर, विनय मोघे, महेश लोखंडे, संजय लोणकर, सूर्यकान्त उपाध्याय, छोटूभाई, बालकदास बैरागी, महेश शर्मा, सतीश राठौर, अजय शर्मा, नरेंद्र त्रिवेदी, अरविंद मिश्रा, कुंदन वर्मा आदि उपस्थित रहे।

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