बाल संस्कार – बडो के संघर्ष में घायल होते बच्चे

आलेख-डॉ.सुनीता जैन

बच्चों का बचपन मात्र बचपन नहीं होता,
वह पूरे जीवन की नींव होता है।
इसी बचपन में
उनके मन का विश्वास बनता है,
रिश्तों की परिभाषा बनती है,
और दुनिया को देखने का नजरिया आकार लेता है।
यही बचपन
उनके उत्तम स्वास्थ्य,
मजबूत व्यक्तित्व
और भावनात्मक संतुलन का आधार बनता है।
इस नाज़ुक उम्र में
सिर्फ अच्छे कपड़े, खिलौने और सुविधाएँ ही जरूरी नहीं होते,
जरूरी होता है —
संतुलित भोजन,
अपनों का स्नेह,
रिश्तों में सम्मान,
और घर का शांतिपूर्ण वातावरण।
क्योंकि बड़ों के संघर्ष में
सबसे ज्यादा घायल बच्चे होते हैं।
वे ना खुलकर किसी का पक्ष ले पाते हैं,
ना ही अपने मन की पीड़ा ठीक से कह पाते हैं।
वे चुप रहते हैं,
लेकिन घर की हर आवाज, हर कटु शब्द,
हर ताना, हर दूरी
अपने भीतर धीरे-धीरे जमा करते जाते हैं।
बड़ों को अक्सर लगता है
कि बच्चे छोटे हैं,
उन्हें कुछ समझ नहीं आता।
पर सच यह है कि
बच्चे हर चीज़ देख रहे होते हैं,
हर व्यवहार महसूस कर रहे होते हैं।
वे देख रहे होते हैं
कि कैसे अपने ही अपनों से दूर हो जाते हैं,
कैसे रिश्तों में संवाद की जगह
संदेह और अहंकार ले लेते हैं,
कैसे प्रेम के स्थान पर
मन में जहर बोया जाता है।
बच्चे वही सीखते हैं
जो घर में रोज घटित होता है।
अगर घर में सम्मान होगा,
तो वे सम्मान सीखेंगे।
अगर घर में अपनापन होगा,
तो वे प्रेम बाँटना सीखेंगे।
अगर घर में धैर्य और शांति होगी,
तो वे संवेदनशील और संतुलित बनेंगे।
लेकिन यदि घर में हर समय
झगड़े, कटुता, आरोप और अविश्वास होगा,
तो वही धीरे-धीरे
उनके स्वभाव का हिस्सा बन जाएगा।
धीरे-धीरे वे उम्र से पहले समझदार होने लगते हैं।
वे खुलकर हँसने से पहले
सोचना सीख जाते हैं।
वे अपनी बात कहने से पहले
डरना सीख जाते हैं।
वे लोगों पर भरोसा करने से पहले
सावधान रहना सीख जाते हैं।
और सबसे दुखद बात यह है कि
बच्चे केवल दर्द सहते ही नहीं,
बल्कि वही सीखी हुई पीड़ा
आगे अपने अपनों को लौटाने भी लगते हैं।
जिस बच्चे ने रिश्तों में अविश्वास देखा होगा,
वह बड़ा होकर
हर रिश्ते में शक करने लगेगा।
जिस बच्चे ने अपमान देखा होगा,
वह कभी ना कभी
किसी और को वही अपमान देगा।
जिस बच्चे ने प्रेम के बदले राजनीति देखी होगी,
वह रिश्तों को दिल से नहीं,
फायदे, भय और असुरक्षा से समझने लगेगा।
यही कारण है कि
बड़ों के संघर्ष केवल दो लोगों तक सीमित नहीं रहते।
वे पीढ़ियों तक असर छोड़ जाते हैं।
आज जो बच्चा
घर के झगड़ों के बीच चुप बैठा है,
कल वही बड़ा होकर
वैसी ही दूरियाँ,
वैसी ही कठोरता
और वैसी ही टूटन
अपने रिश्तों में दोहरा सकता है।
इसलिए बच्चों को केवल
भौतिक सुविधाएँ देना पर्याप्त नहीं है।
उन्हें चाहिए होता है —
एक सुरक्षित बचपन,
जहाँ प्रेम हो,
सम्मान हो,
संवाद हो,
और ऐसा घर हो
जहाँ वे बिना डर के मुस्कुरा सकें।
इसलिए जब भी घर में संघर्ष हो,
बड़ों को एक बार
बच्चों की आँखों में जरूर देखना चाहिए।
क्योंकि बच्चे केवल उस समय रोते नहीं हैं,
वे भीतर ही भीतर बदल भी रहे होते हैं।
सच तो यही है—
बड़ों के संघर्ष एक दिन समाप्त हो जाते हैं,
लेकिन बच्चों के भीतर बने घाव
बहुत लंबे समय तक जीवित रहते हैं।

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