मृत्यु के बाद भी जीवित रहेगी मानव सेवा की भावना : घोटा परिवार ने लिया देहदान का प्रेरक संकल्प

रतलाम। “देह मिटती है, लेकिन सेवा अमर हो जाती है” — इस भाव को साकार करते हुए घासजाजार निवासी धर्मनिष्ठ श्रावक स्व. पूनमचंद घोटा के सुपुत्र मणिलाल घोटा, पुत्रवधु श्रीमती मधु घोटा, पौत्र मयंक घोटा एवं पौत्रवधु श्रीमती पूनम घोटा ने सामूहिक रूप से देहदान का संकल्प लेकर समाज के समक्ष मानवता, संवेदनशीलता और सेवा का अनुपम उदाहरण प्रस्तुत किया है।
आज जब समाज में मृत्यु के बाद शरीर केवल एक परंपरा बनकर रह जाता है, ऐसे समय में घोटा परिवार ने यह संदेश दिया है कि मनुष्य का शरीर मृत्यु के पश्चात भी चिकित्सा शिक्षा, शोध एवं जरूरतमंदों के लिए उपयोगी बनकर अनेक जिंदगियों में नई आशा जगा सकता है।
यह प्रेरणादायी निर्णय भारतीय रेडक्रॉस सोसायटी चेयरमैन प्रितेश गादिया, सेवा भारती अध्यक्ष अनुज छाजेड़, नेत्रम संस्था संस्थापक हेमंत मूणत, साधुमार्गी जैन संघ अध्यक्ष विनोद मेहता एवं समता युवा संघ अध्यक्ष अर्पित गांधी की सेवा एवं जनजागरण गतिविधियों से प्रेरित होकर लिया गया।

घोटा परिवार ने कहा कि —
“यदि हमारा शरीर मृत्यु के बाद भी किसी के काम आ सके, किसी विद्यार्थी की शिक्षा में सहायक बने, किसी शोध को दिशा दे सके, तो यही जीवन की सच्ची सार्थकता है।”
परिवार का यह निर्णय केवल एक व्यक्तिगत संकल्प नहीं, बल्कि पूरे समाज के लिए एक प्रेरक संदेश है। देहदान एवं अंगदान को लेकर समाज में अनेक भ्रांतियाँ एवं संकोच आज भी विद्यमान हैं, किन्तु ऐसे साहसिक एवं जागरूक कदम समाज में नई चेतना जागृत करते हैं।
सामाजिक एवं धार्मिक संगठनों ने घोटा परिवार के इस महान निर्णय की भावभीनी सराहना करते हुए इसे “मानवता की सर्वोच्च सेवा” बताया। प्रबुद्धजनों ने कहा कि ऐसे प्रेरणादायक उदाहरण ही समाज में सकारात्मक परिवर्तन की नींव रखते हैं और आने वाली पीढ़ियों को सेवा, संवेदना एवं परोपकार का मार्ग दिखाते हैं।
यह संकल्प निश्चित रूप से जनमानस में देहदान के प्रति जागरूकता बढ़ाने के साथ-साथ अनेक परिवारों को भी मानव सेवा के इस महाअभियान से जुड़ने की प्रेरणा देगा।

संदेश
“मृत्यु अंत नहीं…
यदि देहदान हो, तो वही किसी के जीवन, शिक्षा और शोध की नई शुरुआत बन जाती है।”

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