गुरु परम्परा के जीवंत दीप स्तम्भ शिक्षाविद संतोष जैन ‘गुरुजी’

लेखक – डॉ. जैनेंद्र जैन

‘गुरु ब्रह्मा, गुरु विष्णु, गुरु देवो महेश्वर:’ – भारतीय संस्कृति में गुरु को सृष्टि के परम मार्गदर्शक के रूप में प्रतिष्ठित किया गया है। इसी गुरु-परम्परा को अपने तप, त्याग, ज्ञान और संस्कारों से साकार करने वाले व्यक्तित्व हैं शिक्षाविद श्री संतोष कुमार जैन ‘गुरुजी’।
जुलाई 1964 को मध्यप्रदेश के सागर जिले के ग्राम कजिया में स्वर्गीय सेठ श्री सोहनलाल जी जैन ‘गुप्ता’ एवं धर्मपरायण माता श्रीमती यशोदा देवी जैन के सुपुत्र के रूप में जन्मे श्री संतोष कुमार जैन ने बचपन से ही अध्ययन, अनुशासन और संस्कारों को अपने जीवन का आधार बनाया।
प्राथमिक शिक्षा ग्राम कजिया में आठवीं तक पूर्ण करने के उपरांत उन्होंने खुरई स्थित जैन गुरुकुल में नवमी से ग्यारहवीं तक अध्ययन किया। लौकिक शिक्षा के साथ-साथ वाणी भूषण, ब्रह्मी मार्गदर्शक पंडित श्री बabulal जी जैन ‘फरसा’ के सान्निध्य में जयपुर एवं इंदौर में धार्मिक एवं सांस्कृतिक शिक्षा भी ग्रहण की। वर्ष 1981 में इंदौर से आई.टी.आई. (अंग्रेजी स्टेनोग्राफी) उत्तीर्ण करने के बाद उन्होंने बी.ए., एल.एल.बी., एम.ए. (अंग्रेजी साहित्य एवं समाजशास्त्र) तथा बी.एड. प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण कर शिक्षा के प्रति अपनी गहन निष्ठा और सतत अध्ययनशीलता का परिचय दिया।
दिनांक 8 दिसम्बर 1982 को शासकीय माध्यमिक विद्यालय, चितोड़ा (सागर) में उप-शिक्षक के रूप में नियुक्ति के साथ उनके गौरवपूर्ण शासकीय सेवाकाल का शुभारम्भ हुआ। सात वर्षों की समर्पित सेवा के पश्चात् वर्ष 1990 में बी.ए. प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण कर वे शासकीय माध्यमिक विद्यालय क्रमांक-55, नूरीश बागार, इंदौर में पदस्थ हुए। वर्ष 1999 में लगभग दस माह शासकीय माध्यमिक विद्यालय, तिल्ली खुर्द में सेवायें देने के बाद जुलाई 2000 से शासकीय माध्यमिक विद्यालय, हुकमखेड़ी (राजगढ़ क्षेत्र) में दीर्घकाल तक विद्यार्थियों को ज्ञान का प्रकाश प्रदान करते रहे।
लगभग बीस वर्षों की उत्कृष्ट सेवा के उपरांत अक्टूबर 2023 में पदोन्नत होकर शासकीय माध्यमिक विद्यालय क्रमांक-31, एस. ए. एफ. लाइन, इंदौर में उच्च श्रेणी शिक्षक के रूप में कार्यभार ग्रहण किया। दिनांक 30 जून 2026 को वे 43 वर्ष 6 माह 24 दिन की गौरवपूर्ण, निष्कलंक एवं प्रेरणादायी शासकीय सेवा पूर्ण कर सेवानिवृत्त हुए। यह केवल एक कर्मचारी की सेवा-निवृत्ति नहीं, बल्कि शिक्षा जगत के एक गौरवपूर्ण अध्याय का पूर्णविराम है।
गृहस्थ जीवन में धर्मपत्नी श्रीमती वंदना जैन के सहयोग से आपने एक आदर्श परिवार का निर्माण किया। पुत्र इंजी. शुभम जैन, पुत्रवधू प्रियंशु जैन, पौत्र विद्यित एवं द्वितीय पुत्र इंजी. सम्यक।
जैन पुत्रवधू साक्षी जैन को संस्कारों की समृद्ध विरासत देकर आपने यह सिद्ध किया कि सच्चा गुरु केवल विद्यालय में ही नहीं, परिवार में भी चरित्र निर्माण का आधार होता है।
अपने पूरे सेवाकाल में गुरुजी ने विद्यार्थियों को केवल पाठ्यक्रम का ज्ञान ही नहीं दिया, बल्कि अनुशासन, नैतिकता, सेवा, संस्कार और राष्ट्रप्रेम के मूल्य भी प्रदान किए। उनके स्नेह, सरलता, कर्मनिष्ठा और मानवीय संवेदनशीलता ने हजारों विद्यार्थियों के जीवन को नई दिशा दी। आज उनके अनेक शिष्य समाज और राष्ट्र के विभिन्न क्षेत्रों में उत्कृष्ट सेवायें दे रहे हैं, जो उनके व्यक्तित्व और शिक्षक-साधना की सबसे बड़ी उपलब्धि हैं।
श्री संतोष जैन ‘गुरुजी’ 43 वर्षीय शैक्षिक सेवा की पूर्णता पर भले ही सेवानिवृत्त हुए हैं लेकिन गुरु का जीवन कभी सेवा निवृत नहीं होता वह अपने शिष्यों के चरित्र, संस्कार और उपलब्धियों में अनंतकाल तक जीवित रहता है।
ईश्वर से मंगलकामना है कि श्री संतोष कुमार जैन ‘गुरुजी’ स्वस्थ, दीर्घायु, प्रसन्न एवं सक्रिय रहे तथा आने वाले वर्षों में भी अपने अनुभव, ज्ञान और संस्कारों से समाज का सतत मार्गदर्शन करते रहे। उनका जीवन सदैव भावी पीढ़ियों के लिए प्रेरणा-स्रोत बना रहे।

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