मैं अभिशप्त हूं इसलिए मेरे वंशज भी अभिशप्त हैं

लेखक- प्रो. देवेन्द्र कुमार शर्मा, रतलाम

स्वतंत्रता के बाद जो सामाजिक संरचना बनीं वह बहुत सारे समाज के लिए कष्टदायक- ह्दय विदारक हैं।स्वतंत्रता के बाद जो संविधान लागू किया गया वह कहने को तो समानता के सिद्धांत पर आधारित है परंतु वास्तविकता में ऐसा नहीं है। संविधान में समानता के सिद्धांत में कई अपवाद प्रस्तावित कर दिए गए। एक के साथ न्याय करने के लिए दूसरे को प्रताड़ित किया गया। मेरा मतलब आरक्षण के प्रावधान से है। कहा यह गया कि जो समाज पूर्व में आर्थिक और सामाजिक दृष्टि से प्रताड़ित रहे हैं उन्हें शिक्षा संस्थाओं में प्रवेश के स्तर में छूट दी जाए, साथ ही सरकारी नौकरियों में भी कम नंबर आने पर भी नियुक्ति दी जाए। इन प्रावधानों से कुछ जातियों को जबर्दस्त लाभ तो हुआ किन्तु सामान्य वर्ग को बहुत हानि हुई। एक का वरदान दूसरे का अभिषाप। इसीलिए मैं अभिशप्त हूं और मेरे वंशज भी अभिशप्त है। कितने भी नंबर ले आएं उन्हें न मेडिकल में प्रवेश मिलेगा और ना नौकरियों में जगह। ब्राह्मण, बनिया, ठाकुर स्वतंत्र भारत के शापित समाज हैं।
प्रारंभ में आरक्षण बहुत सीमित प्रतिशत में था लेकिन जैसे-जैसे आरक्षण के लाभ बढ़ते गए वैसे-वैसे आरक्षण प्रतिशत बढ़वाने के प्रयास भी बढ़ते गए। राजनीतिक दलों ने अपने स्वार्थ के लिए आरक्षण बढ़ाने में बहुत उदारता दिखाई। लाभ देने वालों के अपने स्वार्थ रहे हैं और लाभ लेने वालों के अपने स्वार्थ। आरक्षण में संविधान में निहित समानता के सिद्धांत को तार-तार कर दिया। कहां समानता और किसके लिए समानता। राजनीतिक स्वार्थ के लिए आरक्षण का प्रतिशत इतने अधिक बढ़ा दिए गए कि सर्वोच्च न्यायालय को हस्तक्षेप कर कहना पड़ा कि आरक्षण 50 प्रतिशत से अधिक नहीं होना चाहिए। अब तो डाढ़ में खून लग चुका है और नए-नए समाज आरक्षण की मांग करने लगे हैं। आंदोलन करो और आरक्षण पाओ यही वर्तमान का चलन है। जो आरक्षण में नहीं आते वे अभिशप्त हैं, उनके वंशज अभिशप्त हैं इसीलिए मैं भी अभिशप्त हूं और मेरे वंशज भी। बेचारे कितने भी नंबर परीक्षा में प्राप्त कर लें उन्हें प्रवेश नहीं मिलेगा और प्रवेश नही मिलेगा तो काम भी नहीं मिलेगा। इसके दूरगामी परिणाम होते हैं। उचित काम नहीं मिलेगा तो आर्थिक दृष्टि से कमजोर हो जाएंगे। आरक्षण का वास्तविक प्रभाव यही है कि कमजोर को आर्थिक दृष्टि से मजबूत बनाओ और जो मजबूत हैं उसको कमजोर। योग्य युवाओं को उचित अवसर से वंचित करना उन्हें कमजोर करना ही है। नुकसान तो देश का ही होता है पर इसकी परवाह किसे। अब सब कुछ संख्या से निर्धारित होता है। वोट चाहिए उसके लिए कुछ भी करेंगे।
आरक्षण के औचित्य पर कई बार सुगबुगाहट हुई, चर्चा भी हुई परंतु उचित विवेचना कभी भी नहीं हुई। कमजोर की मदद से किसी को भी इनकार नहीं किन्तु हमारे देश में आरक्षण का प्रभाव बहुत हद तक नकारात्मक है। इसका मूल सिद्धांत कमजोर को सहारा देने के लिए सशक्त को कमजोर करो। आरक्षण ने एक नई प्रकार की सामाजिक विषमता उत्पन्न कर दी है। हम ऐसे कई युवाओं को जानते है जिनको उनकी योग्यता अनुसार परिणाम प्राप्त नहीं हुआ। कम योग्यता वाले तो प्रसाद पा ही रहे है किन्तु उसकी कीमत योग्य चुका रहे है। एक का लाभ दूसरे की हानि। मन बहुत व्यथित होता हैं। ऐसे असंख्य है जिनकी यही मानसिक स्थिति है पर क्या करें प्रजातंत्र है। संख्या से ही सब निर्धारित होता है।
वर्तमान व्यवस्था इस आधार पर आधारित है कि पूर्वजों की सजा वर्तमान पीढ़ी को दी जाएं। योग्य युवाओं की व्यथा सुनने वाला कोई नहीं। सवर्णों की संख्या कम है इसलिए उन्हें प्रताड़ित किया जाता है। शिक्षा के क्षेत्र में भी जहर घोला जा रहा है। यूजीसी नियम इसका प्रमाण है। यूजीसी नियम बहुत ही अनावश्यक है क्योंकि अजा-अजजा के लिए पहले ही कई नियम संविधान में निहित है फिर शिक्षा के क्षेत्र में यूजीसी नियम लाकर विष घोलने की क्या जरूरत थी। यह केवल सवर्ण को दबाने और तिरस्कार करने की मानसिकता का प्रतिबिंब है।
सरकारी योजनाएं भी सवर्ण विरोधी बनाई जाती है। मध्यप्रदेश में एक मेधावी छात्र योजना है जिसके अंतर्गत 85 प्रतिशत अंक लाने वाले विद्यार्थी को प्रवेश के साथ ही छात्रवृत्ति भी प्रदान की जाती है किन्तु इसमें एक अवरोध लगा दिया गया है। जिस सामान्य श्रेणी के मेधावी छात्र के अभिभावक की आय एक निश्चित सीमा से अधिक होगी उसे इस योजना का लाभ नहीं मिलेगा। इस प्रावधान से सवर्ण समाज के अधिकतर मेधावी छात्र योजना का लाभ प्राप्त करने से वंचित रह गए। एक हाथ से देना, दो हाथ से लेना यही शासन की सरकारी योजनाओं की मंशा रहती हैं। मेरे खुद के पौत्र-पौत्री यह सजा भुगत चुके हैं। यही भारत का प्रजातंत्र है। संख्या बल है तो जो मन में आए सो करो। धन्यवाद सरकारी व्यवस्था। स्पष्ट है कि सवर्णों को सभी लाभ से वंचित रखने के षड़यंत्र हैं।
बच्चे वर्तमान व्यवस्था के औचित्य पर प्रश्न पूछते हैं। क्या उत्तर दूं। मेरे पास कोई उत्तर नहीं। मन बहुत व्यथित है।

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